(Being and Nothingness) सार्त्र का अस्तित्ववाद (Existentialism) इस विचार पर केंद्रित है कि इंसान के पास कोई 'तयशुदा स्वभाव' (essence) नहीं होता, बल्कि हम अपने चुनावों के माध्यम से खुद को गढ़ते हैं।
• स्वतंत्रता का बोझ : सार्त्र के अनुसार, मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए 'अभिशप्त' (condemned to be free) है। हमारी हर पसंद के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं, जिसे स्वीकार करना डरावना हो सकता है।
• बैड फेथ (Bad Faith)l: जब हम अपनी स्वतंत्रता से भागते हैं और यह बहाना बनाते हैं कि 'हमारे पास कोई विकल्प नहीं था', तो हम 'बैड फेथ' में जी रहे होते हैं।
• नथिंगनेस (शून्यता) : इंसान कभी पूर्ण नहीं होता, हम हमेशा 'कुछ बनने' (becoming) की प्रक्रिया में होते हैं। यही खालीपन हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।
• दूसरों की नजर (The Look): जब कोई हमें देखता है, तो हम एक 'ऑब्जेक्ट' की तरह महसूस करने लगते हैं, जो हमारी स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। सार्त्र कहते हैं, 'हेल इज अदर पीपल' (दूसरों का होना ही नर्क है) का अर्थ इसी दबाव से है।
• अस्तित्व और अर्थ: सार्त्र का प्रसिद्ध सिद्धांत है 'एग्जिस्टेंस प्रिसीड्स एसेंस' (अस्तित्व सार से पहले आता है)। इसका मतलब है कि हम पहले पैदा होते हैं, और अपने कार्यों से अपना अर्थ खुद बनाते हैं।
•। प्रामाणिकता: एक सच्चा जीवन वह है जहाँ हम अपनी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को बिना किसी बहाने के स्वीकार करते हैं।
निष्कर्ष:
ज़िंदगी कोई पूर्व-लिखित स्क्रिप्ट नहीं है, बल्कि एक अधूरा कैनवास है। आप कौन हैं, यह आपकी पसंद और निर्णयों से तय होता है, न कि समाज, किस्मत या किसी बाहरी ताकत से।
## कभी सोचा है कि तुम कौन हो? नहीं, नाम या रिश्तों से नहीं, सचमुच कौन हो? तुम एक बेटा हो, एक दोस्त हो, एक काम करने वाले इंसान हो। यह तो सब लेबल है। लेकिन अगर यह सब छीन लिए जाए तब क्या बचता है?
यही सवाल जीन पॉल सारत्र अपनी महान किताब बीइंग एंड नथिंगनेस में पूछते हैं। सार कहते हैं कि इंसान है लेकिन साथ ही नहीं भी है। क्योंकि हमारा होना किसी ठोस पत्थर की तरह निश्चित नहीं है। हम लगातार बदल रहे हैं। हमारी पहचान हर पल नई बनती है। वह कहते हैं कि इंसान दो हिस्सों में जीता है। बीइंग इन इट सेल्फ वस्तु की तरह होना। जैसे पत्थर, पेड़, कुर्सी। यह चीजें बस है। इन्हें खुद के बारे में कुछ पूछने की जरूरत नहीं।बीइंग फॉर इटसेल्फ। चेतन होना। यानी इंसान हम अपने बारे में सोच सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं, शक कर सकते हैं। यही हमें बाकी चीजों से अलग बनाता है। लेकिन इसके साथ आती है आजादी। और सारत्र का कहना है इंसान आजाद होने के लिए अभिशाप्त है। हां, कंडेम टू बी फ्री। सोचो इसका क्या मतलब है?
तुम अपने हर चुनाव के लिए जिम्मेदार हो। चाहे नौकरी चुनना हो, किसी रिश्ते को निभाना हो या बस सुबह उठकर बिस्तर से निकलना हो, हर एक फैसला तुम्हारा है। लेकिन यही आजादी कई बार डरावनी भी लगती है। क्योंकि अगर सब कुछ मेरे चुनाव का नतीजा है तो मेरे दर्द, मेरी नाकामी, उसका दोष किसे दूं? किस्मत को, भगवान को, समाज को नहीं। सारत्र कहते हैं कोई बहाना नहीं। हम ही अपने चुनाव हैं। अब सोचो क्या कभी तुम्हें ऐसा लगा है कि तुम एक रोल निभा रहे हो? जैसे वेटर अपनी मुस्कान को मजबूरी से पहनता है। जैसे बॉस ऑफिस में अकड़ दिखाता है। भले ही अंदर से टूट रहा हो। सारत्र इसे कहते हैं बैड फेथ।
खराब नियत से जीना। जब हम खुद को झूठ बोलते हैं। जब हम कहते हैं मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। जबकि सच यह है कि हमेशा विकल्प होते हैं। हम ही उनसे भागते हैं। सारात्र हमें झकझोरते हैं। वह कहते हैं तुम वही हो जो तुम अपने चुनाव से बनते हो।कोई स्थाई स्वभाव एसेंस नहीं है। पहले तुम पैदा होते हो। फिर अपने चुनाव से ही अपनी पहचान बनाते हो। यानी इंसान का मतलब ही है प्रोजेक्ट बनना। हम खुद को हर दिन करते हैं। जैसे कोई कलाकार कैनवास पर रंग भरता है। लेकिन यही सबसे कठिन हिस्सा है। अगर सब कुछ मेरे चुनाव पर है तो मैं अपने दुख के लिए भी जिम्मेदार हूं। सोचो कितनी बार हम दूसरों पर ठिकरा फोड़ते हैं। मुझे यह नौकरी करनी पड़ी क्योंकि परिवार चाहता था। मैं इस रिश्ते में हूं इसलिए हूं क्योंकि समाज दबाव डालता है। सारत्र कहते हैं यह सब बहाने हैं। तुम्हा रेपास हमेशा चुनाव है। हां उसकी कीमत जरूर है। अब यहां पर सार कुछ नहीं नथिंगनेस की बात करते हैं। क्योंकि इंसान का होना कभी पूरा नहीं होता। हम हमेशा अधूरे हैं। हमेशा कुछ बनने की ओर बढ़ रहे हैं। और यही खालीपन हमें परेशान करता है। सोचो जब तुम अकेले बैठे होते हो और अचानक बेचैनी चढ़ जाती है। वो जो हल्का डर कि मेरी जिंदगी का मतलब क्या है? वही सार्त्र का नथिंगनेस है। यह खालीपन हमें याद दिलाता है कि हम तयशुदा स्क्रिप्ट में नहीं जी रहे। हम अपना रास्ता खुद बना रहे हैं। तो अब सवाल उठता है क्या यह आजादी बोझ है या एक वरदान?
सोचो। अगर तुम्हें पता हो कि तुम्हारे फैसले ही तुम्हें परिभाषित करते हैं तो क्या तुम वही फैसले लोगे जो अभी ले रहे हो? क्या तुम अभी भी वही नौकरी करोगे? वही रिश्ते निभाओगे, वही आदतें दोहराओगे? सारत्र यही चाहते थे कि हम इस सवाल से बचे नहीं। क्योंकि जितना भी डरावना लगे असल मानवता वही शुरू होती है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का पहला सच यही है।इंसान अपने चुनावों का योगफल है। कोई भगवान, कोई किस्मत, कोई बाहरी ताकत हमें परिभाषित नहीं करती। सिर्फ हमारे चुनाव। अब सवाल तुमसे। क्या तुम आज तक अपने फैसले खुद ले रहे थे या बस बैड फेथ में जी रहे थे यह सोचकर कि मुझे कोई और चला रहा है?
कभी सोचा है जब हम आईने में देखते हैं तो जो चेहरा दिखता है क्या वही मैं हूं या मैं वो हूं जो दूसरों की नजरों में दिखता है जीन पॉल सारत्र यहीं से एक और चौंकाने वाला विचार सामने रखते हैं। दूसरों की नजर सारत्र कहते हैं कि जब कोई और हमें देखता है तो हम अचानक चीज बन जाते हैं। जैसे तुम अकेले कमरे में बैठे हो। आराम से अचानक कोई दरवाजा खोल कर देख ले। उस पल तुम्हें महसूस होता है कि तुम एक ऑब्जेक्ट बन गए हो किसी और की निगाह में। अब अनुभव अजीब है। एक तरफ यह हमें पकड़ लेता है। जैसे हम पर कोई नजर रख रहा है। दूसरी तरफ यह हमें हमारी ही पहचान से दूर कर देता है। हम खुद को वैसे देखने लगते हैं जैसे दूसरा हमें देख रहा है। सोचो तुम सड़क पर चल रहे हो और अचानक किसी अजनबी की निगाह तुम पर टिक जाती है। तुरंत दिमाग में सवाल उठते हैं। मैं कैसा दिख रहा हूं? उन्होंने मुझे जज किया क्या?
यही है सारत्र का द लुक। दूसरों की नजर हमें हमारी आजादी से खींचकर रोल में डाल देती है। अब इससे एक गहरी समस्या पैदा होती है। अगर मैं लगातार दूसरों की नजर में परिभाषित होता रहूं तो क्या मैं कभी खुद हो पाऊंगा? या फिर मेरी पूरी जिंदगी दूसरों के आईने में अपना चेहरा खोजते खोजते बीत जाएगी। सार्थ कहते हैं यही इंसानी रिश्तों की ट्रेजडी है। हम सब एक दूसरे को ऑब्जेक्ट बना देते हैं। हम प्यार में भी, दोस्ती में भी, परिवार में भी कहीं ना कहीं हम दूसरे को पज़ेस करना चाहते हैं। अब यहां पर सारत्र प्रेम लव के बारे में एक कड़वा सच बताते हैं। वह कहते हैं हम जब किसी को प्यार करते हैं तो अक्सर असल में क्या चाहते हैं? हम चाहते हैं कि दूसरा हमें चाहे यानी हम चाहते हैं कि उनकी आजादी उनकी नजर सिर्फ हमें केंद्र में रखे। लेकिन यही तो नामुमकिन है। क्योंकि दूसरा भी उतना ही आजाद है जितना तुम। तुम उनकी आजादी को बांध नहीं सकते। यही कारण है कि प्यार अक्सर संघर्ष बन जाता है।
हम चाहते हैं कि दूसरा हमें ऑब्जेक्ट ना समझे बल्कि हमें चुने। लेकिन जैसे ही वह चुनते हैं उनकी आजादी फिर खतरे में पड़ती है। तो सवाल है क्या इंसान कभी किसी रिश्ते में पूरी तरह स्वतंत्र रह सकता है? सारत्र का जवाब है नहीं रिश्ता हमेशा एक खींचतान का रहेगा तुम्हारी आजादी और उनकी आजादी के बीच यही सार्त्र का अस्तित्ववाद एग्जिस्टेंशियलिज्म का क्रूर सच है। हम आजाद हैं। लेकिन हमारी आजादी लगातार दूसरों की आजादी से टकराती रहती है। अब जरा सोचो क्या कभी तुम्हें ऐसा महसूस हुआ है कि किसी ने तुम्हें फिक्स कर दिया है? जैसे तुम तो ऐसे ही हो। तुम हमेशा यही गलती करते हो।यह वही पल है जब कोई और तुम्हें परिभाषित करने की कोशिश करता है और अगर तुम मान लेते हो तो तुम्हारी आजादी कहीं खो जाती है। सार हमें चेतावनी देते हैं दूसरों की परिभाषाओं में मत फंसो क्योंकि तुम हर पल नए चुनाव कर सकते हो। अब सोचो अगर सार्थ की यह बात सच है कि हर रिश्ता ऑब्जेक्टिफाइंग है तो क्या इसका मतलब है कि हमें अकेले ही रहना चाहिए?
नहीं। सार्थ कहते हैं यह टकराव ही असल में इंसानी स्थिति है। हम इससे भाग नहीं सकते। लेकिन हम इसे समझ सकते हैं। और शायद इस समझ के साथ हम दूसरों से कम उम्मीद रख पाए। कम नियंत्रण, ज्यादा स्वीकार्यता। अब एक और बड़ा सवाल अगर इंसान लगातार नजर में है तो क्या हम सच में कभी अकेले होते हैं? सार्त्र कहते हैं अकेलापन भी एक तरह का इल्ल्यूजन है क्योंकि जैसे ही तुम अपने बारे में सोचते हो तुम्हारे दिमाग में पहले से दूसरों की आवाजें गूंज रही होती है मां-बाप की दोस्तों की समाज की यानी दूसरा हमेशा तुम्हारे भीतर मौजूद है सोचो जरा अगर तुम्हें किसी दिन सच में यहएहसास हो जाए कि कोई और तुम्हें परिभाषित नहीं कर सकता कि हर चुनाव तुम्हारा है। तो क्या तुम वैसे ही जिओगे जैसे अब तक जी रहे हो? या तुम अपनी आजादी को नए ढंग से इस्तेमाल करोगे? क्या तुमने कभी अचानक खालीपन महसूस किया है? वह जो रात के सन्नाटे में चुपचाप आकर बैठ जाता है, वह एहसास कि मेरे होने का मतलब क्या है?
जीन पॉल सारत्र कहते हैं यही है नथिंगनेस शून्यता और यहीं से इंसान की असली समस्या शुरू होती है। सारत्र मानते हैं कि बाकी चीजें जैसे पत्थर, पेड़, मेज बस हैं। उनमें कोई गैर मौजूदगी नहीं होती। लेकिन इंसान इंसान का होना हमेशा अधूरा है। हमेशा किसी बनने की ओर। यानी मैं जो हूं वह सिर्फ आधा सच है। बाकी आधा वो है जो मैं अभी तक नहीं बना। सोचो जब तुम कहते हो मैं लेखक बनना चाहता हूं। तो इसका मतलब है कि अभी तुम लेखक नहीं हो। तुम्हारे भीतर एक खाली जगह है।जिसे तुम भरना चाहते हो। यही खालीपन सार्थ के मुताबिक नथिंगनेस है और यही हमें लगातार धकेलता है कुछ और बनने की ओर।
अब यहां पर सारत्र गहरी बेचैनी की बात करते हैं। बेचैनी किस चीज की? अपनी ही आजादी की। हां, सुनने में अजीब लगता है। लेकिन सोचो जब तुम्हें अचानक यह एहसास हो कि मेरा हर फैसला मेरी पूरी जिंदगी बदल सकता है। क्या यह डरावना नहीं है? उदाहरण लो। तुम पुल के किनारे खड़े हो। नीचे गहरी नदी बह रही है। तुम्हें सिर्फ यह डर नहीं है कि कहीं मैं फिसल ना जाऊं। असल डर यह है कि मैं खुद भी कूद सकता हूं। यही है सार की बेचेनी । आजादी इतनी खुली है कि उसमें गिरने का डर है। लेकिन इंसान यहां पर क्या करता है? वह भागता है। अपनी ही आजादी से भागता है। सारत्र इसे कहते हैं बैड फेथ। बैड फेथ का मतलब है जब हम खुद को धोखा देते हैं। जब हम कहते हैं मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। जबकि सच यह है विकल्प हमेशा था। बस हमने जिम्मेदारी नहीं ली। अब सवाल है हम ऐसा क्यों करते हैं? क्यों हम अपनी आजादी से डरते हैं? क्योंकि आजादी के साथ आती है जिम्मेदारी?
अगर मैं आजाद हूं तो मेरी नाकामी का दोष मैं किसी और पर नहीं डाल सकता। ना समाज पर, ना किस्मत पर, ना भगवान पर। यही वजह है कि लोग अक्सर तयशुदा रोल निभाते हैं। जैसे वेटर खुद को सिर्फ वेटर मान लेता है। जैसे कोई पति सिर्फ पति बनकर रह जाता है। जैसे कोई इंसान खुद को नौकरी, पैसे, पहचान इन लेबलों में कैद कर लेता है। लेकिन सच तुम्हारी पहचान कभी तय नहीं होती। तुम हर पल उसे चुनते हो। अब यहां एक गहरी बात आती है।सारत्र कहते हैं इंसान कभी पूरा नहीं होता क्योंकि जैसे ही तुम एक लक्ष्य पा लेते हो तुरंत दूसराखालीपन सामने आ जाता है। सोचो तुमने मन में ठाना मैं यह डिग्री हासिल करूंगा। मिली खुशी हुई और अगले ही दिन खालीपन लौट आया। अब नया लक्ष्य नई दौड़ यही इंसान की किस्मत है। हम हमेशा बिकमिंग में हैं। कभी बीइंग में नहीं। अब सवाल है क्या यह अंतहीन दौड़ एक सजा है या यही हमारी जिंदगी का मतलब है?
सार्त्र का कहना है यही हमारी असली ताकत है क्योंकि अगर इंसान कभी पूरा हो गया तो उसके पास बनने की चाह ही नहीं बचेगी और चाह बिना जिंदगी क्या यानी हमारी शून्यता ही हमारी सबसे बड़ी ऊर्जा है तो अब सोचो तुम्हारे भीतर जो खालीपन है उससे तुम भागते हो या उसे अपनाते हो क्या तुम उसे दुख समझते हो या उसे एक पुकार की तरह सुनते हो कि अभी बहुत कुछ बाकी है। क्योंकि सारत्र कहते हैं तुम वही हो जो तुम अभी नहीं हो। यानी तुम्हारा सच सिर्फ वर्तमान नहीं है बल्कि वह भी है जो बनने की दिशा में तुमने चुना है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का तीसरा सच यही है। खालीपन तुम्हारा दुश्मन नहीं तुम्हारा रास्ता है। वह तुम्हें पुकारता है आगेबढ़ने के लिए नया बनाने के लिए। अब सवाल यह है क्या तुम उस पुकार को सुन रहे हो या बैड फेथ में छुपकर बस निभा रहे हो?
क्या तुमने कभी महसूस किया है कि दुनिया सिर्फ चीजों से बनी नहीं है बल्कि हर चीज के पीछे एक अदृश्य मतलब छुपा है और वह मतलब कौन देता है तुम जीन पॉल सारत्र कहते हैं इंसान दुनिया को जैसे है वैसे नहीं देखता हम हमेशा उसे किसी प्रोजेक्ट के नजरिए से देखते हैं। मान लो तुम्हारे सामने एक पेड़ है। अगर तुम आराम कर रहे हो तो वह तुम्हें छाया देता है। अगर तुम बढ़ई हो तो वही पेड़ तुम्हें लकड़ी दिखेगा। अगर तुम कवि हो तो वही पेड़ एक प्रतीक बन सकता है। यानी पेड़ वही है। लेकिन उसके मतलब अलग-अलग है। मतलब इस ब्रह्मांड में पहले से नहीं लिखा। मतलब हम इंसान गढ़ते हैं। यही से सारत्र कहते हैं। पहले तुम अस्तित्व में आते हो फिर तुम अपने चुनावों और प्रोजेक्ट से अपनी पहचान एसेंस बनाते हो। अब सोचो अगर मतलब तुम खुद देते हो तो दुनिया कभी स्थिर क्यों लगे?
क्योंकि हम लगातार अपने प्रोजेक्ट बदलते रहते हैं। आज तुम्हारा प्रोजेक्ट हो सकता है पढ़ाई पूरी करना। कल वही बदलकर नौकरी पाना, फिर बदलकर परिवार बनाना। फिर बदलकर अपने बच्चों के लिए कुछ करना। यानी जिंदगी एक सीढ़ी है जिसमें हर पायदान के बाद नया पायदान आता है और यही सीढ़ी कभी खत्म नहीं होती। लेकिन यहां एक और कड़वा सच छुपा है। सारात्र कहते हैं कई बार हम अपने प्रोजेक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं भागने के लिए। भागना किससे? अपने खालीपन से अपने नथिंगनेस से। सोचो कितनी बार हम काम, रिश्ते, आदतें सिर्फ इसलिए पकड़ कर रखते हैं।क्योंकि हम अकेलेपन से डरते हैं। हम अपने ही शून्य का सामना नहीं करना चाहते। लेकिन जितना भागते हैं उतना ही वह भीतर से हमें खाता है। अब सारत्र डेथ की बात करते हैं। मृत्यु उनके लिए मौत कोई अंतिम अर्थ नहीं है। बल्कि मौत वह क्षण है जब हमारा प्रोजेक्ट अचानक अधूरा रह जाता है। यानी मौत हमें पूरा नहीं करती। वह हमें काट देती है। यही सार्त्र का दर्दनाक नजरिया है। मौत हमारी जिंदगी को कभी अर्थ नहीं देती क्योंकि अर्थ हमेशा हमारे प्रोजेक्ट से आता है और वह अधूरे रह जाते हैं। तो सवाल है अगर मौत किसी अंतिम सत्य की तरह हमें पूरा नहीं करती तो फिर क्या करें इंसान?
शास्त्र का जवाब है हर पल जियो क्योंकि तुम्हारा अर्थ कहीं और नहीं किसी और समय नहीं यही अभी बनता है तो अब सोचो अगर तुम जानते हो कि मौत तुम्हें पूरा नहीं करेगी तो क्या तुम अपने आज के चुनाव को अलग तरह से लोगे? क्या तुम किसी रिश्ते को सिर्फ इसलिए खींचोगे क्योंकि समाज कहता है क्या तुम नौकरी से चिपके रहोगे अगर वह तुम्हें भीतर से मार रही है क्या तुम अपने सपनों को टालते रहोगे यह सोचकर कि कभी ना कभी वक्त मिलेगा क्योंकि सच यह है वक्त कभी नहीं मिलेगा तुम्हें खुद बनाना होगा तो बीइंग एंड नथिंगनेस का चौथा सच यही दुनिया में कोई तयशुदा मतलब नहीं है। मतलब तुम बनाते हो और मौत किसी अंतिम जवाब की तरह नहीं आएगी। उससे पहले जो चुनाव तुमने किए वही तुम्हारी कहानी होंगे। तो सवाल यह है क्या तुम अपनी कहानी खुद लिख रहे हो या दूसरों के लिए निभा रहे हो?
क्या तुमने कभी सोचा है कि स्वतंत्रता फ्रीडम सिर्फ एक तोहफा नहीं बल्कि एक भारी बोझ भी है। जीन पॉल सार्थ बार-बार हमें यही याद दिलाते हैं। मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशाप्त है। इसका मतलब क्या है?
सोचो अगर तुम किसी जेल में हो तो वहां तुम्हारे पास चुनाव सीमित है। लेकिन सारत्र कहते हैं असली जेल तो वह है जो हम अपने दिमाग में बना लेते हैं। हम खुद से कहते हैं मेरे पास कोई चारा नहीं। मुझे यही करना पड़ेगा। लेकिन सच हर वक्त हर जगह हमेशा एक चुनाव मौजूद है। भले ही वह चुनाव कितना भी दर्दनाक क्यों ना हो। मान लो तुम एक नौकरी से ना खुश हो। तुम कह सकते हो मेरे पास कोई विकल्प नहीं। मुझे परिवार चलाना है। लेकिन सार्थ कहते हैं यह आधा सच है। पूरा सच यह है तुम्हारे पास विकल्प है। बस तुम उनकी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यानी तुम जिम्मेदार हो। अपनी नाकामी के लिए, अपनी सफलता के लिए, अपने हर कदम के लिए। और यही एहसास इंसान को सबसे ज्यादा डराता है। यही है सार्त्र की ज़िम्मेदारी का आतंक। अब सोचो जब तुम्हें पता हो कि तुम्हारी पूरी जिंदगी तुम्हारे फैसलों पर टिकी है तो तुम कैसा महसूस करोगे?
गौर से देखो। यही जगह है जहां से एंग्विश जन्म लेती है।वह बेचैनी की मेरे चुनाव सिर्फ मुझे नहीं बल्कि इंसानियत की तस्वीर को भी गढ़ रहे हैं। सार कहते हैं जब मैं चुनाव करता हूं तो मैं सिर्फ अपने लिए नहीं चुन रहा। मैं यह भी दिखा रहा हूं कि इंसान को क्या चुनना चाहिए। यानी मेरे चुनाव दूसरों के लिए एक उदाहरण बनते हैं। अब सवाल यह है अगर इंसान इतना स्वतंत्र है तो क्या वह कभी ईमानदारी से जी पाता है? यही शास्त्र ऑथेंटिसिटी की बात करते हैं।
ऑथेंटिसिटी यानी जब इंसान अपनी आजादी और जिम्मेदारी को पूरी तरह स्वीकार करें। इसका मतलब है ना बहाने ना दोषारोपण ना भागना। बस यह मान लेना कि मैं वही हूं जो मैं चुनता हूं। लेकिन सच बताओ क्या हम ऐसे जी पाते हैं?
ज्यादातर नहीं। क्योंकि हम बैड फेथ में जीते हैं। हम खुद से झूठ बोलते हैं कि मेरे हाथ बंधे हैं। लेकिन दरअसल हमने सिर्फ सस्ता रास्ता चुना। तो अब सवाल है अगर आज तुम्हें पूरा सच मानना पड़े कि तुम्हारी जिंदगी तुम्हारेही चुनाव का नतीजा है तो क्या तुम अपने कल के फैसले बदल दोगे?
क्या तुम वही नौकरी, वही रिश्ते, वही आदतें दोहराओगे या तुम साहस करोगे अपनी आजादी को जीने का? क्योंकि सारात्र का कहना है इंसान की असली पहचान वही है जो वह करने की हिम्मत करता है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का पांचवा सच यही है। स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू है। तुम आजाद हो। लेकिन हर चुनाव का बोझ सिर्फ तुम्हारे कंधे पर है। अब सवाल यह है क्या तुम इस बोझ को ईमानदारी से उठाओगे? या फिर बैड फेथ में जीते रहोगे यह सोचते हुए कि जिंदगी तुम्हें घसीट रही है। अब तक हमने सारत्र के तीन बड़े सच देखे। एक इंसान स्वतंत्र होने के लिए अभिशापित। दो हमारी पहचान हर पल चुनावों से बनती है। तीन खालीपन और शून्यता हमारी जिंदगी का हिस्सा है जिनसे भागा नहीं जा सकता। लेकिन अब सवाल उठता है अगर इंसान इतना अकेला और अधूरा है तो क्या उसके जीवन का कोई अंतिम उद्देश्य है?
सार्थ यहां एक कड़वा जवाब देते हैं। कोई तयशुदा उद्देश्य नहीं है। हां, ना कोई भगवान तुम्हारे लिए स्क्रिप्ट लिख रहा है, ना कोई किस्मत तुम्हें खींच रही है। मतलब तुम्हारा उद्देश्य तुम्हें खुद गढ़ना होगा। सोचो यही वजह है कि सारत्र ने कहा इंसान वही है जो वह खुद बनाता है। लेकिन अब दिक्कत यह आती है अगर जीवन का कोई तयशुदा अर्थ नहीं है तो इंसान अक्सर निरर्थकता एब्सोर्डिटी में गिर जाता है। एब्सोर्डिटी का मतलब है हम लगातार अर्थ खोजते रहते हैं। लेकिन ब्रह्मांड हमें कोई जवाब नहीं देता। जैसे खाली आकाश की तरफ चिल्लाना। अब सोचो जब तुम्हें एहसास होता है कि कोई बड़ा अर्थ नहीं है तो तुम्हारे पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो तुम टूट जाते हो और बैड फेथ में भाग जाते हो या फिर तुम इस अर्थ हीनता को गले लगाते हो और खुद अर्थ गढ़ते हो। यही सारत्र हमें साहसिक रास्ता चुनने को कहते हैं। मतलब खुद बनाओ। उदाहरण के लिए मान लो तुम सुबह उठे और सोचा मेरी जिंदगी बेकार है। यह एक नथिंगनेस का अनुभव है। अब या तो तुम कहसकते हो बस सब बेकार है। या फिर तुम कह सकते हो ठीक है। मतलब कहीं बार नहीं है तो मैं ही अपना अर्थ बनाऊंगा। यही इंसान की असली ताकत है।
अब सारत्र यहाँ एक और गहरी बात कहते हैं। मनुष्य हमेशा एक प्रोजेक्ट है। यानी तुम सिर्फ वर्तमान में जो हो वो नहीं हो। तुम हमेशा उस दिशा में हो जिसकी तरफ तुम बढ़ रहे हो। तो अगर तुम कहो मैं लेखक हूं तो सच यह है तुम लेखन की ओर बढ़ता हुआ इंसान हो। तुम्हारी पहचान तुम्हारे वर्तमान में नहीं बल्कि तुम्हारे प्रोजेक्ट में है। लेकिन अब सोचो अगर तुम अपने प्रोजेक्ट चुनना ही बंद कर दो। अगर तुम बस बहाव में बहते रहो तो सार के मुताबिक तुम अपनी आजादी छोड़ चुके हो तब तुम असल में जिंदा नहीं हो। बस जी रहे हो। यही कारण है कि सार्त्र कहते हैं असली जीवन वही है जहां तुम अपने प्रोजेक्ट खुद चुनते हो। भले ही वह मुश्किल हो, भले ही उसकी कीमत भारी हो क्योंकि अगर तुमने चुनाव नहीं किया तो कोई और तुम्हारे लिए करेगा और वह जिंदगी तुम्हारी नहीं होगी।अब सोचो जरा। अगर तुमसे अभी पूछा जाए तुम्हारा प्रोजेक्ट क्या है? तो तुम्हारा जवाब क्या होगा?
क्या तुम्हारे पास सच में कोई दिशा है या तुम बस दिन गुजार रहे हो? यह सोचते हुए कि कभी ना कभी सब ठीक हो जाएगा। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का छठा सच यही है। जिंदगी का कोई तयशुदा अर्थ नहीं है। अर्थ तुम्हें खुद बनाना है और हर पल हर चुनाव तुम्हारा अगला प्रोजेक्ट तय करता है। तो सवाल है क्या तुम आज अपनी आजादी से एक नया प्रोजेक्ट चुनोगे या फिर दूसरों केप्रोजेक्ट में फंसे रहोगे? अब तक हमने सार के विचारों में आजादी, शून्यता, चुनाव और प्रोजेक्ट्स को समझा। लेकिन इंसान की जिंदगी सिर्फ अपने आप तक सीमित नहीं है। हम हमेशा दूसरों के साथ जीते हैं। और यही सार सबसे पेचीदा सवाल पूछते हैं। दूसरों के साथ हमारा रिश्ता क्या है?
सारत्र कहते हैं दूसरों के साथ होना कभी सीधा और सरल नहीं होता क्योंकि हर रिश्ता एक तरह का संघर्ष है। क्यों?
क्योंकि जब भी कोई हमें देखता है, वह हमें ऑब्जेक्ट बना देता है और हम भी उन्हें ऑब्जेक्ट बनाने की कोशिश करते हैं। यानी इंसान हमेशा एक जंग में है। अपनी आजादी बचाने और दूसरों की आजादी को पकड़ने कीकोशिश के बीच। सोचो प्यार में हम क्या चाहते हैं? हमचाहते हैं कि दूसरा हमें पूरी तरह चुने। हमारी आजादी को स्वीकार करें। लेकिन साथ ही हम चाहते हैं कि वह हमें कभी ना छोड़े। यानी हम चाहते हैं कि उनकी आजादी हमारी कैदी बन जाए। सार्तात्र कहते हैं यही प्यार की ट्रेजडी है। प्यार में हम दूसरों को पूरी तरह पाना चाहते हैं। लेकिन अगर हमने पा लिया तो वह अब आजाद नहीं रहेगा। और अगर वह आजाद है तो उसे खोने का डर हमेशा रहेगा। यही बात नफरत में भी होती है। जब हम किसी से नफरत करते हैं तब भी हम चाहते हैं कि वह ऑब्जेक्ट बन जाए। हम उन्हें उनकी आजादी से वंचित कर देना चाहते हैं। यानी प्यार हो या नफरत। दोनों में हम दूसरे को उनकी स्वतंत्रता से काटने की कोशिश करते हैं।अब सोचो क्या कोई ऐसा रिश्ता संभव है जहां दो इंसान एक दूसरे की आजादी को पूरी तरह स्वीकार करें?
सारत्र का जवाब साफ है। यह नामुमकिन है। रिश्ता हमेशा एक खींचतान रहेगा। हम इससे भाग नहीं सकते।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें रिश्तों से भागना चाहिए। सार कहते हैं इस संघर्ष को समझना ही असलीईमानदारी है। यानी अगर तुम जानते हो कि दूसरा कभी पूरी तरह तुम्हारा नहीं हो सकता। तो तुम उससे कम उम्मीद रखोगे। तुम उसे बांधने की बजाय उसकी आजादी को स्वीकार करोगे। सोचो जरा तुम्हारे रिश्तों में कितना बैड फेथ है। कितनी बार तुमने किसी को पकड़े रखा सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें छोड़ ना दे। कितनी बार तुमने किसी को बदलने की कोशिश की ताकि वह तुम्हारी परिभाषा में फिट हो जाए और कितनी बार किसी ने तुम्हें फिक्स कर दिया। कहते हुए तुम तो हमेशा ऐसे ही रहोगे। सार हमें एक कटु सच्चाई के सामने खड़ा कर देते हैं। दूसरों के साथ होना हमेशा अधूरा है। लेकिन शायद यही अधूरापन रिश्तों की खूबसूरती भी है। क्योंकि अगर कोई पूरी तरह तुम्हारा भी हो गया तो क्या वह तुम्हें सच में इंसान लगेगा या फिर सिर्फ एक ऑब्जेक्ट बनकर रह जाएगा। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का सातवां सच यही है। रिश्ते संघर्ष है लेकिन सचेत संघर्ष। प्यार तभी ईमानदार है जब वह दूसरे की आजादी को छीनने की बजाय उसे स्वीकार करता है। अब सवाल यह है क्या तुमने अपने रिश्तों में सच में आजादी दी है या फिर तुमने उन्हें अपनी परिभाषा के पिंजरे में कैद कर रखा है?
अब तक सार हमें यह दिखा चुके हैं कि हम आजाद हैं। लेकिन इसी आजादी से डरते हैं। हम रिश्तों में हैं। लेकिन उन्हीं रिश्तों में एक छिपा हुआ संघर्ष है। हम प्रोजेक्ट्स में जीते हैं। लेकिन उनमें भी अधूरापन रहता है। तो अब सवाल उठता है क्या इंसान कभी सच्चा जीवन जी सकता है? सारर्थ का जवाब है हां! लेकिन मुश्किल है और यही है प्रामाणिकता। प्रामाणिकता का मतलब है अपने चुनाव को सचमुच अपना मानना ना बहाने ना झूठ ना बैड फेथ। सोचो अगर तुमने किसी रिश्ते में रहना चुना है तो यह मत कहो कि समाज चाहता था। अगर तुमने नौकरी पकड़ी है तो यह मत कहो कि मेरे पास कोई चारा नहीं। अगर तुमने सपनों को टाला है तो यह मत कहो कि किस्मत ने साथ नहीं दिया। प्रामाणिकता का मतलब है सच मानना कि हर चुनाव तुम्हारा ही है और उसकी कीमत भी तुम्हें ही चुकानी है। लेकिन यहां एक और कठिनाई आती है। सारात्र कहते हैं इंसान अक्सर खुद से भी भागता है। कैसे?
कभी काम में डूब कर, कभी रिश्तों में, कभी आदतों में, हम खुद को रोल में छुपा लेते हैं। जैसे कोई कहे मैं तो बस एक पिता हूं या मैं तो बस एक वेटर हूं। लेकिन यह आधा सच है क्योंकि तुम सिर्फ रोल नहीं हो। तुम हर पल हर चुनाव में कुछ और भी बन सकते हो। अब सोचो क्या तुमने कभी अपने जीवन को सिर्फ निभाया है? जिया नहीं। क्या कभी तुमने वह काम किए जो तुम्हारे दिल ने चुने ही नहीं थे? सिर्फ इसलिए कि ऐसा ही करना पड़ता है। यही है बैड फेथ और यही है वह कैद। जिससे सारात्र हमें बाहर निकलने को कहते हैं। अब यहां सारात्र एक और गहरी बात जोड़ते हैं। हेल इज अदर पीपल। दूसरे लोग ही नरक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारात्र लोगों से नफरत करते थे। उनका मतलब था जब हम अपनी पहचान पूरी तरह दूसरों की नजर से तय करते हैं तो हम अपनी आजादी खो देते हैं। यानी नरक वह नहीं कि लोग मौजूद है। नरक वो है कि हम उनकी नजरों में कैद होकर जीते हैं। तो अब सवाल यह है क्या इंसान सच में आजाद हो सकता है? अगर वह हमेशा दूसरों की नजरमें है शास्त्र का जवाब है हां लेकिन तभी जब तुम यह स्वीकार कर लो कि दूसरे भी उतने ही आजाद हैं जितने तुम यानी तुम उन्हें कंट्रोल नहीं कर सकते। सोचो जरा अगर तुम अपनी जिंदगी के हर चुनाव को बिना किसी बहाने पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर लो तो कैसा महसूस करोगे? क्या तुम हल्के हो जाओगे या और भारी?
क्योंकि सारत्र कहते हैं, प्रमाणिकता का मतलब हल्कापन नहीं है बल्कि पूरा बोझ उठाना है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का आठवां- सच यही है। सच्चा जीवन वही है जिसमें इंसान अपनी आजादी और जिम्मेदारी दोनों को स्वीकार करें। ना दूसरों की नजरों में कैद होकर ना बहानों में छुपकर। अब सवाल यह है क्या तुम अपनी जिंदगी सच में ऑथेंटिक जी रहे हो या अब भी बैड फेथ में छुपे हो? यह सोचकर कि तुम्हारा रास्ता किसी और ने तय किया है। अब तक सार हमें बता चुके हैं कि इंसानआजादी है कि रिश्ते हमेशा संघर्ष है कि जीवन में कोई तयशुदा अर्थ नहीं है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उठता है अगर सब कुछ अधूरा है, सब कुछ संघर्ष है। तो इंसान को जीना कैसे चाहिए?
इंसान को जीना चाहिए क्रियाशील होकर यानी लगातार चुनाव करके लगातार अपना प्रोजेक्ट बनाकर क्योंकि ठहरना ही असली मौत है। सोचो जब तुम कहते हो बस अब और कुछ नहीं कर सकता। वह असल में मौत का पहला स्वाद है क्योंकि जिंदगी वही खत्म होने लगती है जहां इंसान चुनाव करना छोड़ देता है। अब यहां सार एक गहरी बात कहते हैं। मनुष्य भविष्य की ओर झुका हुआ होता है। इसका मतलब है हम कभी सिर्फ वर्तमान में नहीं जीते। हम हमेशा आगे की तरफ खींचे रहते हैं। हमारी पहचान भी वही है जो हम बनने की ओर है। लेकिन यहां पर खतरा यह है अगर तुम अपने भविष्य की कल्पना ही नहीं करते। अगर तुम कोई प्रोजेक्ट चुनते ही नहीं तो तुम दूसरों के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाते हो। यानी तुम अपनी जिंदगी खुद नहीं जीते। तुम दूसरों की पटकथा निभा रहे होते हो।
सारत्र यही चेतावनी देते हैं। तुम्हें हर वक्त तय करना है कि तुम कौन हो। सोचो जरा। अगर तुम किसी रिश्ते में हो तो रोज तुम्हें यह तय करना है। मैं इसे क्यों निभा रहा हूं। अगर तुम किसी काम में हो तो रोज पूछना है कि क्या यह सच में मेरा चुनाव है? वरना धीरे-धीरे तुम बैड फेथ में फिसल जाओगे। अब सारात्र का एक और कठिन विचार है। मनुष्य अधूरा प्रोजेक्ट है। इसका मतलब तुम कभी पूरा नहीं हो सकते। तुम्हारा हर मकसद, हर लक्ष्य, हर सपना, बस एक और सीढ़ी है। तो इंसान को अपने अधूरेपन से जीना सीखना होगा ना कि उसे मिटाने की कोशिश करनी होगी। सोचो तुम्हारे सपनों की लिस्ट कितनी लंबी है और जब एक सपना पूरा होता है तो क्या सच में तृप्ति आती है या अगला सपना तुरंत खड़ा हो जाता है यही है सार का कहना खालीपन भागने की चीज नहीं है वह इंसान कीअसली ऊर्जा है तो अब सवाल यह है अगर जीवन में कोई तय अर्थ नहीं है अगर पूरा होना नामुमकिन है तो इंसान का रास्ता क्या है? सार्त्र कहते हैं रास्ता है लगातार बनना। प्रोजेक्ट चुनना मतलब गढ़ना और अपने चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लेना।तो बीइंग एंड नथिंगनेस का नौवा सच यही है। जीवन स्थिर नहीं है। यह एक सतत निर्माण है। एक अधूरा कैनवास जिस पर हर दिन तुम एक नई रेखा खींचते हो? अब सवाल तुमसे। क्या तुम सच में अपनी जिंदगी का चित्र खुद बना रहे हो? या तुम दूसरों के रंग से अपनीकैनवास भरने दे रहे हो?
अब हम सारात्र के विचारों की यात्रा के आखिरी पड़ाव पर पहुंचते हैं। जहां सवाल सिर्फ फिलॉसोफी का नहीं बल्कि सीधे-सीधे जिंदगी का है। सार हमें एक अंतिम सच्चाई दिखाते हैं। कोई और तुम्हारे लिए जिंदगी का मतलब नहीं गढ़ेगा। ना समाज ना भगवान ना किस्मत।मतलब तुम्हें खुद ही बनाना होगा। अब सोचो अगर कोई पूर्व लिखित स्क्रिप्ट नहीं है तो तुम्हें हर पल अपनी स्क्रिप्टखुद लिखनी होगी। लेकिन यहीं पर सार हमें चेतावनी देते हैं। अगर तुमने चुनाव नहीं किया तो भी तुमने चुनाव कर लिया क्योंकि कुछ ना करना भी एक चुनाव है। अब याद करो हमने शुरुआत में बात की थी बैड फेथ की यानी खुद से झूठ बोलने की। सार्थ कहते हैं बैड फेथ सिर्फ छलावा नहीं बल्कि एक खतरा है। क्योंकि जब तुम बार-बार अपने चुनाव से भागते हो तो धीरे-धीरे तुम्हारी पहचान धुंधली होने लगती है। तुम बस रोल निभाते रहते हो। जैसे कोई नकाब पहनकर भूल जाए कि असली चेहरा कैसा था। लेकिन सार की फिलॉसफी अंधकार में खत्म नहीं होती। वह हमें एक चुनौती देते हैं। ऑथेंटिसिटी यानी पूरी ईमानदारी से अपनी आजादी को अपनाना। अपने चुनाव की जिम्मेदारी लेना और इस स्वीकारोक्ति के साथ जीना कि मैं वही हूं जो मैं चुनता हूं। अब सोचो जरा अगर तुम यह स्वीकार कर लो कि तुम्हारी पूरी जिंदगी सिर्फ तुम्हारेहाथों में है तो क्या तुम अब भी वही फैसले लोगे जो अब तक लेते आए हो? क्या तुम वही नौकरी करोगे जिसे तुम नापसंद करते हो?
क्या तुम वही रिश्ते निभाओगे जिनमें सिर्फ आदत बची है? प्यार नहीं। क्या तुम अपने सपनों को टालते रहोगे? यह सोचकर कि समय आएगा या फिर तुम आज अभी अपनी आजादी को जीना शुरू करोगे। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का अंतिम सच यही है। जीवन का कोई तय अर्थ नहीं है। लेकिन यही अर्थहीनता तुम्हारी सबसे बड़ी आजादी है। क्योंकि अब अर्थ तुम्हें खुद गढ़ना है। तुम हर दिन हर चुनाव में हर कदम पर अपने जीवन को लिखते हो। तुम्हारी जिंदगी कोई किताब नहीं बल्कि एक कैनवास है और उस पर ब्रश सिर्फ तुम्हारे हाथ में है। तो अब सवाल आखिरी बार तुमसे क्या तुम अपनी जिंदगी दूसरों की आंखों से देखोगे या अपनी आजादी से गढ़ोगे?क्या तुम बैड फेथ में भागते रहोगे या ऑथेंटिसिटी में जीने का साहस करोगे?क्योंकि सारात्र का कहना है मनुष्य वही है जो वह खुद से बनाता है। अब तक हमने सारत्र की गहरी जटिल बातें समझी लेकिन शायद तुम्हारे मन में सवाल हो। यह सब मेरे रोजमर्रा की जिंदगी से कैसे जुड़ता है? तो चलो सारात्र के विचारों को तुम्हारे अपने अनुभवों से जोड़कर देखते हैं।
एक- बैड फेथ रोजमर्रा का झूठ। सोचो कितनी बार तुमने खुद से कहा है मुझे यह नौकरी करनी ही पड़ेगी। मैं इस रिश्ते से निकल नहीं सकता। असल में यह बैड फेथ है। तुम्हारे पास हमेशा विकल्प है। लेकिन तुम उसकी कीमत से डरते हो। जैसे अगर तुम नौकरी छोड़ोगे तो मुश्किलें आएंगी। अगर रिश्ता छोड़ोगे तो अकेलापन होगा। लेकिन झूठ यह है कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। सच यह है कि मेरे पास विकल्प है। लेकिन मैं उसकी कीमत नहीं देना चाहता।
दो- दलुक दूसरों की नजर सोचो जब तुम Instagram पर फोटो डालते हो तो किसके लिए डालते हो? क्या सिर्फ अपने लिए या दूसरों की नजर के लिए? यही है सारत्र का दलुक। जैसे ही कोई और तुम्हें देखता है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारी पहचान उनकी नजर में तय हो रही है और तुम उसी हिसाब से अपना रोल निभाने लगते हो।
तीन- फ्रीडम एंड रिस्पांसिबिलिटी चुनाव का बोझ। मान लो तुम सुबह उठकर सोचते हो। आज व्यायाम नहीं करूंगा क्योंकि मैं थक गया हूं। यह भी एक चुनाव है। उसका नतीजा भी तुम्हें ही भुगतना होगा। यानी छोटी से छोटी बातों में भी सारत्र की फिलॉसफी लागू होती है। हर बार तुम चुनाव करते हो और हर बार उसकी जिम्मेदारी तुम्हारे ही कंधों पर होती है।
चार-रिलेशनशिप्स, संघर्ष और आजादी। सोचो जब तुम अपने पार्टनर से कहते हो तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे। क्या यह सचमुच प्यार है? या यह उनकी आजादी को कैद करने की कोशिश है। सारत्र कहते हैं प्यार तभी ईमानदार है जब तुम जानते हो कि दूसरा हमेशा तुम्हें छोड़ सकता है और फिर भी तुम उसे चुनते हो।
पांच- नथिंगनेस खालीपन का सामना। रात को जब तुम अकेले होते हो और अचानक सवाल आता है मैं आखिर कर क्या रहा हूं? वही है सार्त्र का नथिंगनेस। अब यहां तुम दो काम कर सकते हो। या तो उस खालीपन से भाग जाओ। फोन, सोशल मीडिया, शराब या किसी आदत में डूब कर या फिर उसका सामना करो और कहो ठीक है। यह खालीपन मुझे पुकार रहा है। मैं कुछ नया बनाऊंगा। तो सारात्र हमें रोजमर्रा की जिंदगी में तीन चीजें सिखाते हैं।
एक- बहाने मत बनाओ। चुनाव हमेशा तुम्हारा है।
दो- दूसरों की नजरों में मत फंसो। तुम्हारी पहचान तुम्हारे चुनाव से है। उनकी राय से नहीं।
तीन- खालीपन से मत भागो। वही तुम्हारी असली ऊर्जा है।
अब आखिरी सवाल तुमसे।क्या तुम अपनी जिंदगी प्रामाणिकता में जीने के लिए तैयार हो? मतलब हर चुनाव को सचमुच अपना मानकर उसकी पूरी जिम्मेदारी लेकर क्योंकि सारत्र कहते हैं तुम्हारी जिंदगी कोई तयशुदा स्क्रिप्ट नहीं बल्कि एक अधूरा कैनवास है और उस पर रंग भरने का काम सिर्फ तुम्हारे हाथ में है।
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