पुरुष की दूसरी स्त्री के प्रति आकर्षण और वैवाहिक जीवन में बोरियत की समस्या पर आध्यात्मिक दृष्टि है।
आकर्षण का असली कारण :
• जब कोई पुरुष किसी अन्य स्त्री की ओर आकर्षित होता है, तो वह वास्तव में वासना से प्रेरित नहीं होता, बल्कि अपने भीतर की 'जीवंतता' (vitality) की कमी को पूरा करना चाहता है।
• यह आकर्षण नई स्त्री के प्रति नहीं, बल्कि जीवन में खोए हुए रोमांच और ताजगी की प्यास है।
2. 'ऊब' और दृष्टि का दोष:
• समस्या पत्नी में नहीं, बल्कि देखने वाले की 'मृत दृष्टि' (dead vision) में है समय के साथ, पति अपनी पत्नी को एक इंसान के रूप में देखना बंद कर देता है और उसे केवल एक 'भूमिका' (मां, पत्नी, गृहिणी) के रूप में देखने लगता है।
• मन हमेशा अज्ञात (unknown) की ओर भागता है। जब पत्नी 'ज्ञात' (familiar) हो जाती है, तो मन ऊब जाता है।
3. समाधान: नई आंखें, न कि नई स्त्री:
• यदि आप दूसरी स्त्री को अपनाएंगे, तो कुछ समय बाद वहां भी वही ऊब पैदा हो जाएगी, क्योंकि आपकी देखने की कला नहीं बदली है।
• ओशो का सुझाव है कि अपनी दृष्टि को ताज़ा करें। हर सुबह अपनी पत्नी को ऐसे देखें जैसे पहली बार देख रहे हों—बिना कल की स्मृतियों और अपेक्षाओं के।
4. प्रेम एक साधना है:
• प्रेम कोई वस्तु नहीं जिसे पा लिया जाए; यह एक निरंतर बहने वाली प्रक्रिया है।
• जब प्रेम में 'ध्यान' (awareness) शामिल हो जाता है, तो वह कभी पुराना नहीं होता स्त्री को भोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक रहस्य (mystery) के रूप में देखें।
निष्कर्ष:
वीडियो का सार यह है कि आकर्षण से भागने के बजाय, अपने भीतर की चेतना को जगाएं। जिस दिन आप भीतर से ताजे होंगे, आपको हर रिश्ता नया और जीवंत महसूस होगा।
## तुम किसी और स्त्री को देखते हो और अचानक तुम्हारा दिल धड़क उठता है। तुम्हें लगता है यह पाप है। यह गलत है। नहीं यह पाप नहीं है। यह जीवन की पुकार है।तुम्हारे भीतर कुछ मरा पड़ा है। और वह किसी नए स्पर्श, किसी नई आंख, किसी नए स्वर से जगना चाहता। तुम कहते हो मेरी पत्नी है। मैं उसे प्यार करता हूं। पर क्या सचमुच प्यार करते हो या बस आदत हो गई है जो रोज पास हो वह धीरे-धीरे पृष्ठभूमि बन जाता है वह अब दिखाई नहीं देता क्योंकि मन परिचित चीज को देखना बंद कर देता है तुम अपनी पत्नी को नहीं देखते तुम बस जानते हो कि वह है और यहीं से आकर्षण मर जाता है मन हमेशा अज्ञात की तरफ भागता है जो अनजान है, वही रस देता है। जो जाना हुआ है, वह अब उबाऊ हो गया है। नवीनता मनुष्य की गहरी भूख है। और जबतुम्हारा घर, तुम्हारा संबंध, तुम्हारा प्रेम सब पुराना पड़ जाता है। तब तुम बाहर किसी और में वही भूख खोजनेलगते हो। दूसरी स्त्री नई नहीं होती। वह सिर्फ अपरिचित हो और अपरिचित में रोमांच है, डर है, उत्सुकता है जो जीवन का स्वाद देता है। नई स्त्री में तुम्हें कोई नई सुंदरतानहीं मिलती। बस अपनी ही पुरानी बोरियत का इलाज मिल जाता है। वो दवा नहीं भ्रम है। जिस दिन तुम्हारे भीतर प्रेम जीवित होगा, तब ना कोई दूसरी चाहिए होगी। ना पहली में उब रहेगी क्योंकि प्रेम ना स्त्री में है ना पुरुष मेंप्रेम तुम्हारी दृष्टि में जो भीतर से मृत है वह सबको नीरस पाएगा और जो भीतर से जीवित है वह हर चेहरा नया पाएगा तुम दूसरी स्त्री की ओर इसलिए खींचते हो क्योंकि पहली में रहस्य मर गया पर रहस्य कभी मरता नहीं वह तुम्हारी आंख से ओझल हो जाता है। तुम्हें अपनी दृष्टिबदलनी है। स्त्री नहीं। तुम समझो यह आकर्षण शरीर का नहीं ऊब का है। यह वासना नहीं। जीवन की पुकार है। क्योंकि तुमने जीना भूल गया है। और हर नई स्त्री तुम्हें यह भ्रम देती है कि शायद अब तुम फिर से जी पाओगे। लेकिन याद रखना जो मर चुका है वह किसी नए से नहीं जगेगा। वह तभी जगेगा जब तुम भीतर से देखना शुरू करोगे। तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आकर्षण दूसरी स्त्री की ओर है। पर सच्चाई यह है कि तुम्हारा आकर्षण नई ऊर्जा की ओर है। तुम्हारा मन ऊब गया है।ऊब वही बीमारी है जो सबसे ज्यादा फैल चुकी है। पर किसी डॉक्टर की किताब में उसका इलाज नहीं लिखा।तुम सोचते हो ऊ पत्नी से है? नहीं ऊब तुमसे है। पत्नी तो वैसी ही है जैसी पहले दिन थी। बदला है तुम्हारा देखना।पहले तुम प्रेमी थे। अब स्वामी बन गए। पहले हर शब्द, हर हंसी, हर स्पर्श नया था। अब सब मालूम है सब तय है और जहां सब तय हो जाता है वहां जीवन रुक जाता है। मन को हमेशा अज्ञात चाहिए। ज्ञात में वह दम घुटने लगता है। पहले तुम्हारी पत्नी रहस्य थी। अब कहानी बन गई। हर पन्ना पढ़ लिया। अब किताब बंद पड़ी। अब तुम दूसरी किताब ढूंढ रहे हो। मनुष्य स्थायित्व चाहता होऔर साथ ही नवीनता भी। यही उसकी त्रासदी है। वह कहता है मुझे स्थिर प्रेम चाहिए और फिर उसी प्रेम से ऊब जाता है। वो कहता मुझे सुरक्षा चाहिए। और फिर उसी सुरक्षा में दम घुटता है। यह द्वंद ही तुम्हारे आकर्षण की जड़ है। तुम सोचते हो कि तुम वासना के शिकार हो।नहीं तुम जीवंतता के भूखे हो। वासना बस एक नाम है उस प्यास का जो जीवन की ताजगी ढूंढ रही है। हर नई स्त्री में तुम्हें लगता है कि यही है। यही वो रस है जो खो गया था। पर कुछ दिन बाद फिर वही बात होगी। वही नीरसता वही क्योंकि समस्या स्त्री नहीं देखने वाले कीदृष्टि है। जब मन मर जाता है तब वासना पैदा होती है। वासना जीवन की जगह ले लेती है। जो जीवन को गहराई से नहीं जी पाता वह शरीर में जीवन ढूंढता है। जो चेतना के आनंद को नहीं जानता वह देह के सुख को पकड़ लेता है। और देह का सुख उतना ही है जितनी देरसांस अटक जाए। फिर वही शून्यता वही खालीपनविवाह समाज की जरूरत है। प्रेम अस्तित्व की जरूरत है। विवाह स्थिरता देता है। प्रेम गति देता है और जहां गति को रोका जाता है वहां नदियां सूख जाती है। पति और पत्नी अगर प्रेम में ध्यान लाएं तो विवाह साधना बन जाता है। और अगर ध्यान ना हो तो वही विवाह सबसे बड़ी कैद बन जाता है। तुम्हारा मन बाहर भागता है क्योंकि तुम भीतर से खाली हो। तुम सोचते हो नई स्त्री मुझे पूरा कर देगी पर नई स्त्री क्या करेगी वह भी कुछ महीनों में पुरानी हो जाएगी क्योंकि तुम नए नहीं हुए जिस दिन तुम नए हो जाओगे हर चेहरा नया लगेगा हर स्पर्श नया लगेगा यह बाहर बदलने की बात नहीं यह भीतर जागने की बात है तुम्हारा आकर्षण प्राकृतिक है पर तुम्हारी समझ अधूरी है। प्रकृति चाहती है कि तुम जियो और समाज चाहता है कि तुम टिके रहो। समाज को सुरक्षा चाहिए और जीवन को रोमांच चाहिए। इसलिए भीतर दो आवाजें चलती हैं। एक कहती है स्थाई रहो। दूसरी कहती बदल जाओ। एक कहती है पत्नी को निभाओ। दूसरी कहती है नहीं को देखो और इन दोनों के बीच आदमी फंस जाता है ना पूरा प्रेम कर पाता है ना पूरी वफादारी यह द्वंद इसलिए है क्योंकि तुमने प्रेम कोसमझा नहीं प्रेम कोई वस्तु नहीं कि उसे पा लिया जाए और रख लिया जाए प्रेम हर क्षण जन्म लेता है हर दिन उसे नवीकरण चाहिए हर दिन एक नया मिलन चाहिएतुम पत्नी को देखते हो पर उसे नया नहीं देखते। तुम्हारी नजर में धूल जम गई है। और जब तक आंखें साफ नहीं होंगी हर नया चेहरा भी पुराना लगने लगेगा। समझो आकर्षण तुम्हारी कमी नहीं। संकेत है कि तुम्हारा मन जड़ हो गया है। जो भीतर से जीवित है उसे कोई दूसरी नहीं लुभा सकती। जो भीतर से मरा है। उसे हर नई देह में जीवन का भ्रम दिखाई देता है। दूसरी स्त्री में तुम्हें वह नहीं दिखता जो वह तुम्हें वह दिखता है जो तुमने खो दिया है। तुम अपने भीतर की ताजगी खोज रहे हो। और उसे बाहर किसी और में देख रहे हो। यही भूल है। जिस दिन तुमभीतर से ताजे हो जाओगे। तुम्हें कोई और स्त्री आकर्षक नहीं लगेगी। क्योंकि तब तुम्हारा प्रेम स्थिर नहीं रहेगा। वह हर पल जीवित रहेगा। फिर तुम्हारी पत्नी भी अजनबी लगेगी। हर सुबह नई हर रात अपरिचित। और यही अपरिचय ही प्रेम का रहस्य तुम सोचते हो कि आकर्षण देह का है। पर देह तो सबकी एक सी है। बस चेहरा ख्याल और रंग थोड़ा बदल जाता है। वास्तव में यह आकर्षण ऊर्जा का है। तुम्हारा मन उसी दिशा में खींचता है जहां उसे नया कंपन महसूस होता है। नई स्त्री में तुम्हें वही कंपन दिखता है जो तुम्हारे भीतर मर गया। तुम दूसरी स्त्री में उसे नहीं खोज रहे जो वह है। तुम उसे खोज रहे हो जो तुमने खो दिया है। वो जीवंतता वो ताजगी वो रोमांच जो कभी तुम्हारे भीतर था। अब मर चुका है। अब तुम उसे किसी और की आंखों में ढूंढ रहे हो। यही भ्रम है। जिस दिन तुम भीतर जीवित हो जाते हो। वह आकर्षणअपने आप मिट जाता है क्योंकि तब हर चेहरा नया लगता है। हर देह में वही परम ऊर्जा दिखाई देती है। फिर कोई दूसरी नहीं होती। हर स्त्री उसी दिव्यता का दूसरा रूप होती है। तब तुम्हें बदलना नहीं पड़ता। बस देखनापड़ता है। आकर्षण का असली कारण है मृत दृष्टि। जो भीतर से मर गया है, वह बाहर से सुंदरता खोजता है। जो भीतर से ताजगी में है, वह बाहर से कुछ नहीं मांगता। वह जहां देखता है, वहां सौंदर्य है। क्योंकि उसकी आंख जीवित है। उसकी दृष्टि जागी हुई है। वही दृष्टि अगर मर जाए तो देवी भी नीरस लगती है। और वही दृष्टि अगर जीवित हो जाए तो साधारण स्त्री में भी ईश्वर दिख जाता है। सौंदर्य बाहर नहीं है। सौंदर्य देखने वाले की आंख में तुम स्त्री नहीं बदलना चाहते। तुम खुद को बदलना चाहते हो। पर रास्ता उल्टा चुनते हो। तुम बाहर बदलते हो भीतरनहीं। नई स्त्री आती है। थोड़ी देर में वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है। क्योंकि देखने वाला वही है जिसने पहले भी सब कुछ मर जाने दिया था। दूसरी स्त्री में तुम्हें जो आकर्षण दिखता है वह वास्तव में स्वयं की भूली हुईचिंगारी वह तुम्हारे भीतर की जिज्ञासा का प्रतिबिंब है जो फिर से जलना चाहती है पर तुम बाहर दौड़ते हो और अंदर की आग बुझती जाती है। जिस दिन तुम यह देख लोगे कि आकर्षण बाहर नहीं भीतर की आवाज है। उस दिन तुम उसे बाहर खोजना छोड़ दोगे। फिर प्रेम नया जन्म लेगा ना किसी और से बल्कि उसी से जो पहले से पास है। तुम्हारा देखना नया हो जाएगा और वही नया देखना सबसे बड़ा पुनर्जन्म है। तुम सोचते हो कि नई स्त्री चाहिए। पर सच्चाई यह है कि तुम्हें नई आंख चाहिए।क्योंकि जिसे देखने की कला नहीं आती। वह हर नई चीज को भी पुराना बना देता है। तुम वही आदमी हो जो पहले था। सिर्फ वस्तु बदल गई। पहले तुम एक चेहरे से ऊबे अब दूसरे से उबोगे। क्योंकि ऊब किसी के कारण नहीं होती। ओब तुम्हारे भीतर की मृत दृष्टि का परिणामहै। नई स्त्री तुम्हें नहीं लगती। क्योंकि तुम्हारी कल्पना उसे ढंक लेती है। तुम उसे देखते नहीं। तुम अपने स्वप्न को उस पर चिपका देते हो। और जब वह स्वप्न टूटता हैतब वही कहानी फिर से शुरू होती है। वह भी वैसी ही निकली। वो वैसी ही नहीं निकली भाई। तुम ही वही होजो पहले थे। तुम हर बार एक ही व्यक्ति को ढूंढते हो अपने भीतर की कमी को। नई स्त्री का आकर्षण स्त्री में नहीं है। वह तुम्हारे मन की भूख में है। तुम सोचते हो कि नया चेहरा तुम्हें नया जीवन देगा। पर जीवन चेहरों से नहीं आता। जीवन जागरूकता से आता है। एक फूल रोज खिलता है। पर माली हर दिन उसे नए की तरह देखता है।क्योंकि उसकी आंखें जमी नहीं। प्रेम भी फूल की तरह है। हर दिन खिलता है। अगर तुम उसे देखने की कला जानते हो। पर तुम फूल को नहीं फूल की तस्वीर को देखते हो और तस्वीर कभी नहीं खिलती। दूसरी स्त्री इसलिए लुभाती है क्योंकि तुम्हारे भीतर अब भी खोज की एक हल्की लौ बाकी है। पर अगर तुम सचमुच खोजी होतो खोज बाहर क्यों कर रहे हो? जो बाहर बदलता है वह कुछ समय बाद फिर वैसा ही हो जाता है। जो भीतर बदलता है वो हमेशा नया रहता है। यही विरोधाभास है। मनुष्य बाहर से बदलाव चाहता है। पर भीतर वही रहता है। और इसलिए हर नया संबंध पुराने जैसा हो जाता है।दूसरी स्त्री का आकर्षण झूठ नहीं है। लेकिन उसका अर्थ तुमने गलत समझा है। वह आकर्षण तुम्हें बाहर नहीं बुला रहा। वह कह रहा है भीतर लौट आओ। तुम्हारा प्रेम सूख गया है। उसे फिर से जलाओ। नई स्त्री अगर सचमुच तुम्हें नया बना दे तो उसे प्रणाम करो। लेकिन अगर वह भी कुछ दिनों में बोझ बन जाए तो समझो। समस्या कभी बाहर थी ही नहीं। समस्या यह है कि तुम प्रेम को घटना मानते हो जबकि प्रेम एक निरंतर दृष्टि है जो हर पल बदलती है हर पल देखती है। तुम्हें प्रेम नहीं चाहिए। तुम्हें देखने की ताजगी चाहिए। क्योंकि जहां दृष्टि नई हो वहां सब नया है। प्रेम को समझो। वह स्थाई वस्तु नहीं है कि एक बार पा लिया और बस वह फूल है। हर सुबह खिलता है। हर रात मुरझा जाता है। जो रोज देख सके वही प्रेमी और जो देखना भूल जाए वो पति। तुम कहते हो मैं अपनी पत्नी से ऊब गया हूं। मैं कहता हूं तुम्हारी आंख उग गई। स्त्री वही है। उसकी सांसे वही है। उसकीमुस्कान वही है। पर तुम्हारा देखना बदल गया। पहले तुम प्रेमी थे। हर इशारा नया था। हर स्पर्श कविता था। अब तुम पति हो गए। सब तय है। सब परिचित थे। जहां सब ज्ञात हो जाए वहां रस नहीं रहता। रस वहां रहता है जहां रहस्य है। प्रेम को जीवित रखना है तो उसे रहस्यमय रखना पड़ेगा। स्त्री को जानने की कोशिश मत करो।क्योंकि जैसे ही तुम कहो मैं उसे जानता हूं। वह तुम्हारे भीतर मर गई। स्त्री को समझो नहीं। बस देखो। हर दिन वो नहीं होती। हर दिन उसके भीतर नया मौसम चलता है। पर तुम्हारी दृष्टि इतनी जड़ है कि देख नहीं पाती।ध्यान दो। पत्नी वही रहती है। पर प्रेमी की आंख बदलती जाती है। पहले वह स्त्री को देखता है। धीरे-धीरे वह सिर्फ भूमिका देखने लगता है। पत्नी मां गृहिणी। जैसे हीवह भूमिका देखने लगता है व्यक्ति खो जाते हैं। जहां व्यक्ति नहीं वहां प्रेम नहीं। प्रेम भूमिका से परे है। अगर तुम सच में प्रेम करना चाहते हो तो रोज उस व्यक्ति को देखो जो तुम्हारे साथ है जिसे पहली बार देख रहे हो। हर सुबह उसे नए की तरह देखो। बिना कल की स्मृति बिना कल की अपेक्षा। कल की तस्वीरें मिटा दो। वही स्त्री तुम्हें फिर से अपरिचित लगेगी और अपरिचय में ही आकर्षण है। दूसरी बात स्त्री को वस्तु मत बनाओ। वो कोई पुरस्कार नहीं। वो एक रहस्य है। और रहस्य को भोगा नहीं जा सकता। उसे महसूस किया जा सकता है। जिस दिन तुमने उसे भोग की वस्तु बना दिया वह तुम्हारे लिए मर गई। अब वह सिर्फ शरीर रह गई है और शरीर में रस नहीं टिकता। रस दृष्टि में पुरुष को यह समझना होगा स्त्री शरीर नहीं ऊर्जा है। वह प्रेम की दिशा है।तुम्हारी चेतना को ऊंचा उठा सकती है। अगर तुम उसे देखने की कला जानते हो और देखने की कला वही है। ध्यान ध्यान का अर्थ है देखना बिना इच्छा के सुनना बिना निर्णय के। जिस दिन तुम ऐसा देखोगे प्रेम ध्यान बन जाएगा और जब प्रेम ध्यान बन जाता है तब उसमें कभी ऊब नहीं आती क्योंकि ध्यान में सब नया है हर पल नयातीसरी बात प्रेम को पकड़ो मत जितना पकड़ोगे वो उतना ही फिसलेगा प्रेम पकड़ने की चीज नहीं वो बहने कीप्रक्रिया दिया है। पत्नी तुम्हारी संपत्ति नहीं वह जीवन की सहयात्री है। उसे बांधोगे तो वह मर जाएगी। उसे खुला छोड़ोगे तो हर बार लौटेगी नए रूप में नई सुगंध में। तुम्हारा प्रेम तब तक जिंदा रहेगा जब तक तुम उसे कैद नहीं करोगे। हर रिश्ता उस दिन मरता है जब उसमें मेरा प्रवेश करता है। मेरा यही जहर है जहां मैं और मेरा खत्म होता है। वहीं प्रेम शुरू होता है। और सबसे बड़ी बात प्रेम को उत्सव की तरह जियो। हर मिलन नया आरंभ है। हर बिछड़न भी अवसर है। क्योंकि जब तुम दूर जाते हो तबफिर मिलने की प्यास जन्म लेती है और वही प्यास प्रेम को पुनर्जन्म देती है। इसलिए जब तुम्हारा मन दूसरी स्त्री की ओर जाता है तो उसे दबाओ मत। बस देखो कि तुम क्यों भाग रहे हो। भागो मत देखो। देखना ही ध्यान है और ध्यान ही परिवर्तन है। देखतेदेखते तुम्हें समझ आ जाएगाकि दूसरी स्त्री में कुछ नहीं था। जो नहीं था वो तुम्हारे भीतर था। जिस दिन तुम भीतर की आंख खोल लोगे तुम्हें सब में वही रस दिखाई देगा। तुम्हारी पत्नी भी वही होगीपर अब उसमें प्रेम का प्रकाश दिखेगा। और तब तुम्हें किसी दूसरे की जरूरत नहीं रहेगी क्योंकि तुम्हारा देखना ही इतना नया होगा कि सब कुछ पहली बार जैसा लगेगा। प्रेम वस्तु नहीं वह देखने का ढंग है। जिस दिन तुम्हारी दृष्टि बदलती है उस दिन सारी दुनिया बदल जाती है। स्त्री वही रहती है। पुरुष वही रहता है। पर देखने वाला नया हो जाता है। और वही नया देखना प्रेम है। तुम प्रेम को तलाशते हो। पर प्रेम तो हर जगह है। वह तुम्हारी सांस में है। तुम्हारी आंख में है। तुम्हारी पत्नी केमौन में है। बस तुम्हारी दृष्टि धूल से ढंक गई है। दूसरी स्त्री तुम्हें इसलिए आकर्षित करती है क्योंकि उसमें तुम्हें अपना ही भुला हुआ जीवन दिखाई देता है। पर समझो जीवन किसी और में नहीं। वह तुम्हारे भीतर सोया है। जगाना है तो बाहर मत दौड़ो। भीतर लौटो। प्रेम का अर्थ है हर पल फिर से देखना। हर बार नए की तरह देखना।जब तुम देखना सीख जाओगे। बिना कल की स्मृति बिना कल के भय तब वही पत्नी वही चेहरा वही संबंध फिर से नया लगने लगेगा और तब तुम समझोगे दूसरी स्त्री कभी थी ही नहीं वह तो तुम्हारे भीतर की दूसरी आंख थी जो अब खुल गई प्रेम वहीं जन्म लेता है जहां देखने वाला जाग जाता है फिर ना ऊब बच बचती ना वासना बस मौन बचता है और उस मौन में रस है अनंत रस। अब कुछ मत सोचो। बस कुछ क्षण अपनी आंखें बंद करो। देखो तुम्हारे भीतर भी कोई स्त्री है। कोई पुरुष है। दोनों मिल रहे हैं। बिना नाम बिना संबंध बस मिल रहे हैं। यही मिलन प्रेम है। यही मिलन मुक्ति है और यही मिलन सत्य है।
No comments:
Post a Comment