Tuesday, 7 April 2026

* द माइंड-गट कनेक्शन - हिन्दी

 'द माइंड- गट कनेक्शन'   कैसे हमारा पेट (Gut) हमारे मूड, ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य को कंट्रोल करता है।

•  दो दिमाग: हमारे शरीर में दो दिमाग हैं—एक मस्तिष्क में और दूसरा आंतों (Gut) में । आंतों में रहने वाले अरबों बैक्टीरिया हमारे मूड, गुस्से और फोकस को प्रभावित करते हैं।


• वेगस नर्व (Vagus Nerve): यह पेट और दिमाग के बीच एक सीधा कनेक्शन है। 90% सिग्नल दिमाग से पेट की तरफ नहीं, बल्कि पेट से दिमाग की तरफ जाते हैं ।


•  सेरोटोनिन और गाबा: 90% 'हैप्पी हॉर्मोन' (सेरोटोनिन) आंतों में बनता है। खराब खाना खाने से गुड बैक्टीरिया मर जाते हैं, जिससे डिप्रेशन और एंजायटी जैसी समस्याएं होती हैं।


•   लीकी गट (Leaky Gut) और ब्रेन फॉग: गलत खान-पान से आंतों की दीवार कमजोर हो जाती है, जिससे टॉक्सिंस खून के जरिए दिमाग तक पहुँचते हैं, जिसे 'लीकी ब्रेन' कहा जाता है।


आपका बैटल प्लान :


1. दुश्मनों को भूखा मारें: शुगर, प्रोसेस्ड फूड और वेजिटेबल ऑयल्स का पूरी तरह त्याग करें ।


2. दीवारों की मरम्मत: फास्टिंग (उपवास) करें, ताकि शरीर मरम्मत (Repair) पर ध्यान दे सके ।


3. नई सेना तैयार करें: प्रीबायोटिक्स (प्याज, लहसुन, ओट्स) और प्रोबायोटिक्स (दही, छाछ, कांजी) का सेवन बढ़ाएं ।


निष्कर्ष यह है कि जब तक आप अपनी डाइट को नहीं जीतते, तब तक आप अपनी मानसिक स्थिति पर नियंत्रण नहीं पा सकते।


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'द माइंड-गट कनेक्शन'  हमारे मस्तिष्क और आंतों (gut) के बीच गहरे वैज्ञानिक आधार हैं। हमारा पेट केवल पाचन तंत्र का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य, भावनाओं और मूड को नियंत्रित करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है। 


गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis): आंत और मस्तिष्क एक 'हाइवे' के माध्यम से लगातार संवाद करते हैं, जिसे 'गट-ब्रेन एक्सिस' कहा जाता है। इसमें मुख्य भूमिका 'वेगस नर्व' (vagus nerve) की होती है ।


माइक्रोबायोम का महत्व: हमारी आंतों में लाखों सूक्ष्म जीव होते हैं जिन्हें 'माइक्रोबायोम' कहते हैं। ये न केवल पाचन में मदद करते हैं, बल्कि सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे 'हैप्पी हार्मोन' बनाने में भी महत्वपूर्ण हैं, जो हमें मानसिक रूप से शांत और खुश रखते हैं ।


तनाव और आंत: जब हम तनाव (stress) में होते हैं, तो शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन रिलीज होता है, जो पाचन को धीमा कर देता है और आंतों की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है ।


बचपन के अनुभवों का प्रभाव: बचपन के ट्रॉमा या तनावपूर्ण माहौल का असर हमारे गट-ब्रेन एक्सिस पर पड़ता है, जो आगे चलकर एंग्जायटी या पेट की समस्याओं के रूप में सामने आ सकता है ।


उपचार और सुझाव:


डाइट: फाइबर से भरपूर भोजन, फल, सब्जियां, और फर्मेंटेड चीजें (जैसे दही, किमची) अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं।


जीवन शैली: डीप ब्रीथिंग (प्राणायाम), मेडिटेशन, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि मानसिक और आंतों की सेहत को सुधारने के लिए आवश्यक हैं ।


यह एक होलिस्टिक अप्रोच (Holistic Approach) अपनाने की सलाह है, जहां मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए आंतों का ख्याल रखना उतना ही जरूरी है जितना कि दिमाग का। अंततः, यदि आप तनाव या डिप्रेशन से जूझ रहे हैं, तो अपने पेट की जरूरतों को समझना हीलिंग की ओर पहला कदम हो सकता है।


किमची बनाने की रेसिपी क्या है?

किमची बनाने की वि​धि

  1. पत्तागोभी को काट कर एक ग्लास के कटोरे में रखें। उसमें ऊपर से नमक डालकर मिला लें।

  2. करीब तीन से चार घंटे के लिए साइड रख दें। फिर इसमें से पानी निचोड़ लें।

  3. तेल के अलावा सभी सामग्री को एक साथ मिला लें। एक टाइट जार में भरें। ... 

  4. सर्व करते समय उसके ऊपर तिल का तेल डालें। परोसें।

Wednesday, 1 April 2026

*तुम्हारे - ग्रह- नक्षत्र -कर्म —काल से परे है.!!

 # क्या मनुष्य का जीवन ग्रह नक्षत्रों से बंधा है? क्या जन्म पत्री ही हमारे सुख-दुख का लेखा है?

अपने अज्ञान को पहचानो। ग्रह तुम्हें नहीं चलाते तुम उन्हें देखते हो, तुम नक्षत्रों से परे हो, काल से परे हो, कर्म से परे हो, धर्म बाहरी क्रिया नहीं- भीतरी जागरण है। ग्रहों का प्रभाव मन पर है- आत्मा पर नहीं, कर्म बंधन नहीं, यदि कर्ता का अभिमान नहीं- तब पूजा व्यापार नहीं प्रेम बन जाती है! दान भय नहीं- करुणा बन जाती है। तब जन्मपत्री कागज रह जाती है और तुम अनंत आकाश बन जाते हो। ग्रह नक्षत्र अपने पथ पर चलते रहेंगे। कर्म अपना फल देगें, जो स्वयं को जान लेता है, वह इन सबके पार सदा मुक्त, सदा शांत, सदा पूर्ण है।


# राजा जनक सभा में बैठे थे। उनके मुख पर जिज्ञासा थी। हृदय में द्वंद्व था। उन्होंने पूछा भगवन क्या मनुष्य का जीवन ग्रह नक्षत्रों से बंधा है? क्या जन्म पत्री ही हमारे सुख-दुख का लेखा है? क्या पूजा और दान से भाग्य बदला जा सकता है या कर्म ही अंतिम सत्य है? 


तब अष्टावक्र मुनि मुस्कुराए। उनकी वाणी में करुणा थी। पर शब्द वज्र के समान कठोर थे। उन्होंने कहा जनक यदि तेरा आत्मा शुद्ध निराकार और अकर्ता है तो ग्रह किसे बांधेंगे नक्षत्र किसे चलाएंगे जिसको तू मैं मानता है, वही भ्रम है जब तक तू शरीर को मैं समझता है तब तक तू जन्म पत्री के पन्नों में बंधा रहेगा, जिस दिन तू जान लेगा कि तू ना शरीर है ना मन है ना बुद्धि है तू शुद्ध साक्षी है उस दिन ग्रहों का प्रभाव तुझ पर समाप्त हो जाएगा। 


जनक ने पुनः प्रश्न किया। परंतु शास्त्रों में तो ग्रहों की महिमा कही गई है। यज्ञ और दान का विधान बताया गया है। अष्टावक्र बोले शास्त्र अज्ञानी को मार्ग दिखाने के लिए है। ज्ञानी को बांधने के लिए नहीं जो अपने को शरीर मानता है उसके ये ग्रह हैं। दोष हैं उपाय है। पर जो आत्मा को जान लेता है उसके लिए न शुभ है न अशुभ। तूने सुना होगा कि श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं! “कर्मण्यवाधिकारस्ते” कर्म कर फल की चिंता मत कर परंतु मैं तुझ से कहता हूं कर्म भी अंततः मन का खेल है तू साक्षी बन जा कर्म स्वतः शुद्ध हो जाएगा।


 जनक बोले तो क्या पूजा और दान व्यर्थ है अष्टावक्र ने कहा यदि पूजा भय से है तो वह व्यापार है यदि दान दिखावे से है तो वह अहंकार है यदि व्रत स्वर्ग की इच्छा से है तो वह सौदा है। पर यदि कर्म सहज है, निष्काम है तो वही धर्म है।


उन्होंने एक कथा सुनाई। एक व्यक्ति अपनी जन्मत्री लेकर ज्योतिषी के पास गया। ज्योतिषी ने कहा, तेरे जीवन में दुख ही दुख है, हर क्षण भारी है। वह व्यक्ति भयभीत हो गया। उसने यज्ञ कराए, दान दिए पर मन का भय नहीं गया। एक दिन वह एक ज्ञानी के पास पहुंचा, ज्ञानी ने पूछा क्या तू दुखी है? उसने कहा नहीं क्या तू दुख है?

नहीं। तो तू कौन है? उस क्षण उसे बोध हुआ कि वह साक्षी है। उसी दिन उसका भय समाप्त हो गया। 


अष्टावक्र बोले जनक ग्रहों का प्रभाव उस पर है जो स्वयं को सीमित मानता है। पर आत्मज्ञानी के लिए आकाश भी छोटा है। तूने सुना होगा कि कहते हैं अहम आत्मा ब्रह्म। जब आत्मा ही ब्रह्म है तो ग्रह किसके ऊपर शासन करेंगे? सभा में मौन छा गया। अष्टावक्र आगे बोले जन्मपत्री केवल प्रारब्ध का संकेत है पर तेरा चैतन्य प्रारब्ध से परे है। जैसे सूर्य पर बादल का प्रभाव नहीं होता वैसे ही आत्मा पर ग्रहों का प्रभाव नहीं होता। बादल केवल देखने वाले की दृष्टि को ढकते हैं। 


जनक ने पूछा तो क्या हमें कर्म छोड। देना चाहिए? अष्टावक्र ने हंसकर कहा नहीं जनक  कर्म छोड़ने की बात भी अज्ञान है। कर्म को त्यागने वाला भी कर्म कर रहा है। बस इतना जान ले कि तू करता नहीं है। जब यह जान लेगा तब कर्म बंधन नहीं रहेगा। उन्होंने उदाहरण दिया। राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का पालन किया। चाहे ग्रह अनुकूल हो या प्रतिकूल। यदि वे जन्म पत्री देखकर निर्णय लेते तो सत्य की महिमा प्रकट ना होती। इसी प्रकार प्रहलाद ने ईश्वर भक्ति नहीं छोड़ी। चाहे ग्रहों का योग कैसा भी रहा हो। सत्य और श्रद्धा कर्म से प्रकट होती है। ग्रहों से नहीं। अष्टावक्र बोले जनक संसार भय से चलता है। यह मत करो अशुभ होगा। वह करो शुभ होगा। पर आत्मा ना शुभ है ना अशुभ। जब तू इस सत्य को जान लेगा तब पूजा भी सहज होगी। दान भी सहज होगा और कर्म भी शुद्ध होगा। तब तू ग्रहों से नहीं अपने बोध से चलेगा। जनक की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा भगवन आज तक मैं राज सिंहासन पर बैठकर भी भय में था। आज समझ आया कि बंधन बाहर नहीं भीतर है। 


अष्टावक्र ने अंतिम वचन दिया। ग्रह नक्षत्र आकाश में है। पर तू आकाश से भी व्यापक है। पूजा और दान साधन है। पर सत्य तेरा स्वभाव है। जन्म पत्री एक कागज है। पर तू अनंत चेतना है। जान ले कर्म तभी धर्म है जब उसमें मैं का अभिमान ना हो। अन्यथा सब अंधविश्वास है। सभा में शांति छा गई। उस दिन जनक ने जाना कि भाग्य बदलने का रहस्य मंदिरों में नहीं। भीतर के बोध में है। और अष्टावक्र की वाणी गूंजती रही। तू ना ग्रह है, ना शरीर है, ना कर्म है, तू शुद्ध साक्षी है, मुक्त है, नित्य है। सभा का मौन अभी टूटा भी ना था कि राजा जनक ने पुनः प्रश्न किया। भगवन यदि आत्मा साक्षी है और ग्रह नक्षत्र केवल देह और मन के स्तर पर प्रभाव डालते हैं तो फिर शास्त्रों में ग्रह शांति यज्ञ दान और उपायों का इतना विस्तृत वर्णन क्यों है?

क्या यह सब व्यर्थ है? 


अष्टावक्र मुनि ने जनक की ओर स्थिर दृष्टि से देखा और कहा, जनक व्यर्थ वह नहीं जो अज्ञान में किया जाए। व्यर्थ वह है जो ज्ञान के बाद भी पकड़े रखा जाए। शास्त्र सीढ़ी है मंजिल नहीं जो सीढ़ी को ही घर समझ ले वही भ्रम में है। तूने सुना होगा कि मैं मैंने कहा यदि तू मुक्त होना चाहता है तो विषयों को विष की भांति त्याग दे और क्षमा सरलता दया और संतोष को अमृत की तरह धारण कर। यहां मैंने कहीं ग्रहों का भय नहीं बताया क्योंकि भय मन का निर्माण है आत्मा का नहीं। जनक ने कहा परंतु मनुष्य का मन तो डगमगाता है। वह भविष्य जानना चाहता है। सुरक्षा चाहता है। 


अष्टावक्र बोले और यही चाह उसे ज्योतिष की पकड़ में ले जाती है। भविष्य जानने की लालसा ही भय का बीज है। जो वर्तमान में स्थित है उसे भविष्य की चिंता नहीं रहती। ग्रहों का गणित मन को आश्वासन देता है। पर आत्मबोध मन को मौन कर देता है। उन्होंने एक कथा कही। 


एक ब्राह्मण प्रतिदिन अपनी कुंडली देखता। हर कार्य से पहले मुहूर्त पूछता। एक दिन नदी में उसका पुत्र डूबने लगा। उसने आकाश की ओर देखा। अभी राहु काल है। तब तक पुत्र बह गया। अष्टावक्र बोले जनक मुहूर्त जीवन से बड़ा नहीं होता। साहस और करुणा ही सच्चा शुभ मुहूर्त है। सभा में सन्नाटा गहरा गया। जनक ने पूछा तो क्या ग्रहों का कोई अस्तित्व ही नहीं?


मुनि बोले अस्तित्व है पर सत्ता नहीं। जैसे स्वप्न में सिंह दिखता है वह दिखता तो है पर जागने पर उसका दांत नहीं काटता। इसी प्रकार ग्रह देह मन के स्तर पर प्रभाव दिखाते हैं। पर जो आत्मा में जाग गया उसके लिए वे स्वप्नवत हैं। उन्होंने स्मरण कराया।प्रकृति के गुण प्रकृति में ही कार्य करते हैं। यदि तू अपने को प्रकृति मानेगा तो ग्रह भी तुझे चलाएंगे। यदि तू अपने को साक्षी जानेगा तो प्रकृति अपना खेल खेलती रहेगी और तू मुक्त रहेगा। जनक ने कहा लोग कहते हैं कि शनि की साढ़े साती जीवन उलट देती है। 


अष्टावक्र मुस्कुराए जनक यदि शनि तुझे गिरा सकता है तो तेरी चेतना कितनी दुर्बल है, जिसने स्वयं को जान लिया उसे ना शनि गिरा सकता है ना भाग्य उठा सकता है। सुख दुख लहरें हैं तू सागर है। लहरें उठेंगी गिरेंगी। सागर की गहराई अचल रहती है। फिर उन्होंने दान पर प्रश्न उठाया। दान किसे देता है मनुष्य ? यदि वह सोचता है कि दान से स्वर्ग मिलेगा तो वह व्यापार कर रहा है। यदि सोचता है कि दान से ग्रह शांत होंगे तो वह भय से प्रेरित है। पर यदि दान करुणा से है तो वह आत्मा की अभिव्यक्ति है। अंतर्भावना का है। क्रिया का नहीं। उन्होंने उदाहरण दिया। राजा बलि ने सब कुछ दान दिया। यहां तक कि अपना सिर भी क्या उसने ग्रह देखकर दान किया था? नहीं! उसका हृदय उदार था। इसी प्रकार विदुर ने सादा भोजन प्रेम से दिया और वह ईश्वर को प्रिय हुआ। अष्टावक्र बोले भाव ही ब्रह्म है। गणना नहीं। 


जनक ने फिर पूछा और जन्म पत्री।क्या उसमें लिखा प्रारब्ध अटल है? मुनि ने उत्तर दिया। प्रारब्ध देह का है। आत्मा का नहीं। देह को भूख लगेगी। वृद्धावस्था आएगी। यह प्रकृति का नियम है। पर तू यदि स्वयं को देह मानेगा तभी दुखी होगा। जैसे अभिनेता मंच पर रोता है। पर भीतर जानता है कि यह अभिनय है। वैसे ही ज्ञानी जीवन जीता है। प्रारब्ध चलता रहता है। पर भीतर शांति अचल रहती है। उन्होंने आगे कहा। तूने देखा होगा कुछ लोग अत्यंत शुभ कुंडली लेकर भी दुखी रहते हैं और कुछ प्रतिकूल योग में भी प्रसन्न रहते हैं। कारण ग्रह नहीं दृष्टि है। दृष्टि बदले तो संसार बदल जाता है। जनक की जिज्ञासा और बढ़ी तो क्या पूजा का कोई स्थान नहीं? अष्टावक्र ने गंभीर होकर कहा। पूजा तब तक आवश्यक है जब तक तू स्वयं को अलग मानता है। जब तक तू कहता है मैं यहां हूं। भगवान वहां है तब तक पूजा से मन शुद्ध होता है। पर जब जान लेता है कि अहम ब्रह्मास्मि तब पूजा ध्यान में बदल जाती है। ध्यान मौन में और मौन आत्मबोध में उन्होंने स्मरण कराया कि बार-बार कहते हैं नेति नेति यह नहीं यह नहीं। अर्थात जो भी देखा जाए वह तू नहीं है। ग्रह दिखते हैं। कुंडली दिखती है। शुभ शुभ दिखता है इसलिए तू वह नहीं है। तू तो देखने वाला है। फिर मुनि ने अंतिम प्रहार किया। जनक अंधविश्वास तब जन्म लेता है जब मनुष्य अपनी शक्ति भूल जाता है। वह बाहर सहारा ढूंढता है। कभी ग्रह में कभी रत्न में कभी टोटके में। पर जो भीतर देख लेता है उसे पता चलता है कि उसका चैतन्य ही परम रत्न है। जिसे स्वयं पर विश्वास है उसे राहु काल का भय नहीं सताता। सभा में बैठे विद्वान भी स्तब्ध थे। 


अष्टावक्र बोले धर्म भय से नहीं बोध से जन्मता है। यदि तेरी पूजा तुझे निर्भय बनाती है तो वह सत्य के निकट है। यदि तुझे और डराती है तो वह अज्ञान है। यदि तेरा दान तुझे हल्का करता है तो वह पवित्र है। यदि अहंकार बढ़ाता है तो वह बंधन है। यदि जन्मपत्री तुझे सजग करती है तो ठीक। यदि जकड़ देती है तो त्याज्ञ है। जनक ने विनम्र होकर कहा भगवन अब स्पष्ट हो रहा है कि ग्रह और कर्म दोनों प्रकृति के स्तर पर हैं पर आत्मा उससे परे है। 


अष्टावक्र ने उत्तर दिया यही जानना मुक्ति है। जब तू स्वयं को प्रकृति से पृथक जान लेगा तब न पूजा तुझे बांधेगी न ग्रह डराएंगे न जन्मपत्री सीमित करेगी तब कर्म होगा पर कर्ता का अभिमान नहीं होगा। तब जीवन होगा पर भय नहीं होगा। और उस दिन सभा में यह प्रतिध्वनि देर तक गूंजती रही। ग्रह आकाश में है पर आत्मा अनंत आकाश है। कर्म प्रकृति का है। पर साक्षी शुद्ध अचल और मुक्त है। राजा जनक अब मौन थे। पर उनके भीतर प्रश्नों की अग्नि अभी शांत नहीं हुई थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा भगवन यदि आत्मा अकर्ता है यदि ग्रह केवल प्रकृति के खेल हैं यदि जन्म पत्री देह का लेखा है तो मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए क्या सब कुछ व्यर्थ है क्या ना पूजा का अर्थ है ना दान का ना कर्म का अष्टावक्र मुनि ने गंभीर होकर कहा जनक व्यर्थ कुछ नहीं परंतु सत्य का स्थान जानना आवश्यक है जब साधन को साध्य बना लिया जाता है वही अंधविश्वास जन्म लेता है। मंदिर साधन है, तीर्थ साधन है, व्रत साधन है। पर आत्म बोध साध्य है। जो साधन को ही अंतिम मान लेता है, वह बाहरी क्रिया में उलझा रहता है। जो साधन के पार देख लेता है, वह मुक्त हो जाता है। फिर उन्होंने कहा, तूने देखा होगा मनुष्य ग्रहों के भय से रत्न धारण करता है। विशेष तिथियों की प्रतीक्षा करता है। बार-बार जन्मत्री दिखाता है। परंतु क्या उसने कभी अपने मन को देखा? क्या उसने कभी पूछा कि भय कहां से उठ रहा है? भय ग्रह से नहीं उठता। भय अज्ञान से उठता है। जब तक मैं शरीर हूं यह भ्रांति है। तब तक मेरा भविष्य क्या होगा? यह चिंता रहेगी। पर जिस क्षण जान लेता है कि मैं शुद्ध चैतन्य हूं, उसी क्षण भविष्य का भय गलने लगता है। 


अष्टावक्र ने उदाहरण दिया। मान ले कि कोई व्यक्ति स्वप्न में देखता है कि उसका ग्रह अशुभ है और उस पर संकट आने वाला है। वह स्वप्न में रोता है। उपाय करता है, दौड़ता है। पर जैसे ही जागता है सब समाप्त। जागरण ही उपाय है। उसी प्रकार आत्मज्ञान ही ग्रह दोष की अंतिम शांति है। उन्होंने स्पष्ट कहा तू ना करता है ना भोगता है। तू सदा मुक्त है। यदि यह वचन हृदय में उतर जाए तो कौन सा ग्रह बांध सकता है? फिर उन्होंने जनक से पूछा क्या आकाश पर धूल टिकती है? क्या सूर्य पर अंधकार स्थाई है? नहीं। वैसे ही आत्मा पर कर्मों का लेप स्थाई नहीं। लेप मन पर है और मन ही परिवर्तनशील है। जनक ने कहा पर भगवन लोग कहते हैं कि बिना पूजा किए कार्य अशुभ हो जाता है। बिना मुहूर्त देखे विवाह यात्रा करने से संकट आता है। अष्टावक्र ने यदि शुभ अशुभ मुहूर्त में है तो साहस कहां है? यदि साहस भीतर है तो हर क्षण शुभ है। जो क्षण तू जागरूक होकर जीता है वही शुभ है। जोअज्ञान में जीता है वही अशुभ है। सूर्य हर दिन उदित होता है। क्या वह पंचांग देखकर निकलता है? सभा में हल्की मुस्कान फैल गई। मुनि ने आगे कहा धर्म का अर्थ है धारण करना। सत्य को करुणा को सरलता को। यदितेरी पूजा तुझे अहंकारी बना दे। मैंने इतना जप किया, मैंने इतना दान दिया तो वह बंधन है। यदि तेरी पूजा तुझे विनम्र बना दे, सब उसी की कृपा है तो वह शुद्धि है। अंतर बाहरी क्रिया में नहीं भीतर की दृष्टि में है। फिर उन्होंने का स्मरण कराया। 


श्री कृष्ण कहते हैं समत्वम योग उच्चते समता ही योग है। उसे ग्रहों का भय नहीं। अष्टावक्र ने एक और दृष्टांत दिया। एक किसान था जिसकी फसल वर्षा से नष्ट हो गई। लोग बोले तेरी कुंडली में दोष है। वह किसान मुस्कुराया और फिर से खेत जोतने लगा। अगले वर्ष अच्छी वर्षा हुई। फसल लहलहा उठी। लोगों ने कहा अब ग्रह अनुकूल है। किसान फिर मुस्कुराया। जनक उस किसान ने ग्रहों से अधिक अपने श्रम और धैर्य पर विश्वास किया। यही कर्म का सत्य है। फिर उन्होंने तीखे स्वर में कहा अंधविश्वास तब जन्म लेता है जब मनुष्य अपने उत्तरदायित्व से भागना चाहता है।वह कहता है मेरी असफलता ग्रहों के कारण है। पर वह यह नहीं देखता कि आलस्य उसका अपना था। ग्रह बहाना बन जाते हैं। जो सजग है वह बहाना नहीं ढूंढता। जनक की आंखों में तेज था। उन्होंने पूछा तो क्या भाग्य का कोई स्थान नहीं? अष्टावक्र ने उत्तर दिया भाग्य पूर्व कृत कर्मों का परिणाम है पर वह अंतिम सत्य नहीं। वह नदी की धारा की तरह है। यदि तू सोया है धारा तुझे बहा ले जाएगी। यदि तू जाग गया तैरना सीख जाएगा। जागरण ही मुक्ति है। उन्होंने कहा याद रख ग्रह नक्षत्र आकाश में घूमते हैं। पर तू उस आकाश का भी साक्षी है। जन्मपत्री तेरा प्रारंभ बता सकती है पर अंत नहीं। पूजा तुझे प्रेरणा दे सकती है पर मुक्ति नहीं दे सकती। मुक्ति केवल आत्मबोध से है। फिर उन्होंने गूढ़ वचन कहा जब तक तू स्वयं को सीमित मानता है तब तक उपाय आवश्यक है। जब तू असीम को जान लेता है। उपाय अपने आप गिरजाते हैं। जैसे नाव से नदी पार की जाती है। पर पार पहुंचकर नाव सिर पर नहीं उठाई जाती। सभा में बैठे आर्ष मुनि भी स्तब्ध थे। अष्टावक्र ने अंतिम उपदेश दिया। 


जनक संसार को त्यागने की आवश्यकता नहीं पर अज्ञान को त्यागना आवश्यक है। ग्रहों को दोष मत दे। अपने अज्ञान को पहचान। पूजा को मत छोड़ पर उसे भय से मत कर। दान को मत रोक पर उसे सौदा मत बना। जन्मत्री को मत फाड़ पर उसे अपने आत्मस्वूप से बड़ा मत मान। जान ले। तू नक्षत्रों से परे है, काल से परे है, कर्म से परे है, तू शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य है। जनक उठ खड़े हुए। उनके नेत्रों में कृतज्ञता थी। उन्होंने कहा भगवन आज ज्ञात हुआ कि धर्म बाहरी क्रिया नहीं, भीतरी जागरण है। ग्रहों का प्रभाव मन पर है,आत्मा पर नहीं, कर्म बंधन नहीं, यदि कर्ता का अभिमान ना हो। अष्टावक्र ने शांत स्वर में कहा यही अंतिम सत्य है। जब तू स्वयं को जान लेता है तब ग्रह तुझे नहीं चलाते तू उन्हें देखता है। तब पूजा व्यापार नहीं प्रेम बन जाती है। तब दान भय नहीं करुणा बन जाता है। तब जन्म पत्री कागज रह जाती है और तू अनंत आकाश बन जाता है। और उस दिन सभा में यह निष्कर्ष अमिट हो गया। ग्रहनक्षत्र अपने पथ पर चलते रहेंगे। कर्म अपना फल देगा। पर जो स्वयं को जान लेता है, वह इन सबके पार सदा मुक्त, सदा शांत, सदा पूर्ण है।


* सार्त्र का अस्तित्ववाद

  (Being and Nothingness) सार्त्र का अस्तित्ववाद (Existentialism) इस विचार पर केंद्रित है कि इंसान के पास कोई 'तयशुदा स्वभाव' (essence) नहीं होता, बल्कि हम अपने चुनावों के माध्यम से खुद को गढ़ते हैं।

स्वतंत्रता का बोझ : सार्त्र के अनुसार, मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए 'अभिशप्त' (condemned to be free) है। हमारी हर पसंद के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं, जिसे स्वीकार करना डरावना हो सकता है।

बैड फेथ (Bad Faith)l: जब हम अपनी स्वतंत्रता से भागते हैं और यह बहाना बनाते हैं कि 'हमारे पास कोई विकल्प नहीं था', तो हम 'बैड फेथ' में जी रहे होते हैं।

नथिंगनेस (शून्यता) : इंसान कभी पूर्ण नहीं होता, हम हमेशा 'कुछ बनने' (becoming) की प्रक्रिया में होते हैं। यही खालीपन हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।

दूसरों की नजर (The Look): जब कोई हमें देखता है, तो हम एक 'ऑब्जेक्ट' की तरह महसूस करने लगते हैं, जो हमारी स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। सार्त्र कहते हैं, 'हेल इज अदर पीपल' (दूसरों का होना ही नर्क है) का अर्थ इसी दबाव से है।

अस्तित्व और अर्थ: सार्त्र का प्रसिद्ध सिद्धांत है 'एग्जिस्टेंस प्रिसीड्स एसेंस' (अस्तित्व सार से पहले आता है)। इसका मतलब है कि हम पहले पैदा होते हैं, और अपने कार्यों से अपना अर्थ खुद बनाते हैं।

प्रामाणिकता: एक सच्चा जीवन वह है जहाँ हम अपनी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को बिना किसी बहाने के स्वीकार करते हैं।

निष्कर्ष:

ज़िंदगी कोई पूर्व-लिखित स्क्रिप्ट नहीं है, बल्कि एक अधूरा कैनवास है। आप कौन हैं, यह आपकी पसंद और निर्णयों से तय होता है, न कि समाज, किस्मत या किसी बाहरी ताकत से। 



## कभी सोचा है कि तुम कौन हो? नहीं, नाम या रिश्तों से नहीं, सचमुच कौन हो? तुम एक बेटा हो, एक दोस्त हो, एक काम करने वाले इंसान हो। यह तो सब लेबल है। लेकिन अगर यह सब छीन लिए जाए तब क्या बचता है?


यही सवाल जीन पॉल सारत्र अपनी महान किताब बीइंग एंड नथिंगनेस में पूछते हैं। सार कहते हैं कि इंसान है लेकिन साथ ही नहीं भी है। क्योंकि हमारा होना किसी ठोस पत्थर की तरह निश्चित नहीं है। हम लगातार बदल रहे हैं। हमारी पहचान हर पल नई बनती है। वह कहते हैं कि इंसान दो हिस्सों में जीता है। बीइंग इन इट सेल्फ वस्तु की तरह होना। जैसे पत्थर, पेड़, कुर्सी। यह चीजें बस है। इन्हें खुद के बारे में कुछ पूछने की जरूरत नहीं।बीइंग फॉर इटसेल्फ। चेतन होना। यानी इंसान हम अपने बारे में सोच सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं, शक कर सकते हैं। यही हमें बाकी चीजों से अलग बनाता है। लेकिन इसके साथ आती है आजादी। और सारत्र का कहना है इंसान आजाद होने के लिए अभिशाप्त है। हां, कंडेम टू बी फ्री। सोचो इसका क्या मतलब है?


तुम अपने हर चुनाव के लिए जिम्मेदार हो। चाहे नौकरी चुनना हो, किसी रिश्ते को निभाना हो या बस सुबह उठकर बिस्तर से निकलना हो, हर एक फैसला तुम्हारा है। लेकिन यही आजादी कई बार डरावनी भी लगती है। क्योंकि अगर सब कुछ मेरे चुनाव का नतीजा है तो मेरे दर्द, मेरी नाकामी, उसका दोष किसे दूं? किस्मत को, भगवान को, समाज को नहीं। सारत्र कहते हैं कोई बहाना नहीं। हम ही अपने चुनाव हैं। अब सोचो क्या कभी तुम्हें ऐसा लगा है कि तुम एक रोल निभा रहे हो? जैसे वेटर अपनी मुस्कान को मजबूरी से पहनता है। जैसे बॉस ऑफिस में अकड़ दिखाता है। भले ही अंदर से टूट रहा हो। सारत्र इसे कहते हैं बैड फेथ।


खराब नियत से जीना। जब हम खुद को झूठ बोलते हैं। जब हम कहते हैं मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। जबकि सच यह है कि हमेशा विकल्प होते हैं। हम ही उनसे भागते हैं। सारात्र हमें झकझोरते हैं। वह कहते हैं तुम वही हो जो तुम अपने चुनाव से बनते हो।कोई स्थाई स्वभाव एसेंस नहीं है। पहले तुम पैदा होते हो। फिर अपने चुनाव से ही अपनी पहचान बनाते हो। यानी इंसान का मतलब ही है प्रोजेक्ट बनना। हम खुद को हर दिन करते हैं। जैसे कोई कलाकार कैनवास पर रंग भरता है। लेकिन यही सबसे कठिन हिस्सा है। अगर सब कुछ मेरे चुनाव पर है तो मैं अपने दुख के लिए भी जिम्मेदार हूं। सोचो कितनी बार हम दूसरों पर ठिकरा फोड़ते हैं। मुझे यह नौकरी करनी पड़ी क्योंकि परिवार चाहता था। मैं इस रिश्ते में हूं इसलिए हूं क्योंकि समाज दबाव डालता है। सारत्र कहते हैं यह सब बहाने हैं। तुम्हा रेपास हमेशा चुनाव है। हां उसकी कीमत जरूर है। अब यहां पर सार कुछ नहीं नथिंगनेस की बात करते हैं। क्योंकि इंसान का होना कभी पूरा नहीं होता। हम हमेशा अधूरे हैं। हमेशा कुछ बनने की ओर बढ़ रहे हैं। और यही खालीपन हमें परेशान करता है। सोचो जब तुम अकेले बैठे होते हो और अचानक बेचैनी चढ़ जाती है। वो जो हल्का डर कि मेरी जिंदगी का मतलब क्या है? वही सार्त्र का नथिंगनेस है। यह खालीपन हमें याद दिलाता है कि हम तयशुदा स्क्रिप्ट में नहीं जी रहे। हम अपना रास्ता खुद बना रहे हैं। तो अब सवाल उठता है क्या यह आजादी बोझ है या एक वरदान?


सोचो। अगर तुम्हें पता हो कि तुम्हारे फैसले ही तुम्हें परिभाषित करते हैं तो क्या तुम वही फैसले लोगे जो अभी ले रहे हो? क्या तुम अभी भी वही नौकरी करोगे? वही रिश्ते निभाओगे, वही आदतें दोहराओगे? सारत्र यही चाहते थे कि हम इस सवाल से बचे नहीं। क्योंकि जितना भी डरावना लगे असल मानवता वही शुरू होती है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का पहला सच यही है।इंसान अपने चुनावों का योगफल है। कोई भगवान, कोई किस्मत, कोई बाहरी ताकत हमें परिभाषित नहीं करती। सिर्फ हमारे चुनाव। अब सवाल तुमसे। क्या तुम आज तक अपने फैसले खुद ले रहे थे या बस बैड फेथ में जी रहे थे यह सोचकर कि मुझे कोई और चला रहा है?


कभी सोचा है जब हम आईने में देखते हैं तो जो चेहरा दिखता है क्या वही मैं हूं या मैं वो हूं जो दूसरों की नजरों में दिखता है जीन पॉल सारत्र यहीं से एक और चौंकाने वाला विचार सामने रखते हैं। दूसरों की नजर सारत्र कहते हैं कि जब कोई और हमें देखता है तो हम अचानक चीज बन जाते हैं। जैसे तुम अकेले कमरे में बैठे हो। आराम से अचानक कोई दरवाजा खोल कर देख ले। उस पल तुम्हें महसूस होता है कि तुम एक ऑब्जेक्ट बन गए हो किसी और की निगाह में। अब अनुभव अजीब है। एक तरफ यह हमें पकड़ लेता है। जैसे हम पर कोई नजर रख रहा है। दूसरी तरफ यह हमें हमारी ही पहचान से दूर कर देता है। हम खुद को वैसे देखने लगते हैं जैसे दूसरा हमें देख रहा है। सोचो तुम सड़क पर चल रहे हो और अचानक किसी अजनबी की निगाह तुम पर टिक जाती है। तुरंत दिमाग में सवाल उठते हैं। मैं कैसा दिख रहा हूं? उन्होंने मुझे जज किया क्या?


यही है सारत्र का द लुक। दूसरों की नजर हमें हमारी आजादी से खींचकर रोल में डाल देती है। अब इससे एक गहरी समस्या पैदा होती है। अगर मैं लगातार दूसरों की नजर में परिभाषित होता रहूं तो क्या मैं कभी खुद हो पाऊंगा? या फिर मेरी पूरी जिंदगी दूसरों के आईने में अपना चेहरा खोजते खोजते बीत जाएगी। सार्थ कहते हैं यही इंसानी रिश्तों की ट्रेजडी है। हम सब एक दूसरे को ऑब्जेक्ट बना देते हैं। हम प्यार में भी, दोस्ती में भी, परिवार में भी कहीं ना कहीं हम दूसरे को पज़ेस करना चाहते हैं। अब यहां पर सारत्र प्रेम लव के बारे में एक कड़वा सच बताते हैं। वह कहते हैं हम जब किसी को प्यार करते हैं तो अक्सर असल में क्या चाहते हैं? हम चाहते हैं कि दूसरा हमें चाहे यानी हम चाहते हैं कि उनकी आजादी उनकी नजर सिर्फ हमें केंद्र में रखे। लेकिन यही तो नामुमकिन है। क्योंकि दूसरा भी उतना ही आजाद है जितना तुम। तुम उनकी आजादी को बांध नहीं सकते। यही कारण है कि प्यार अक्सर संघर्ष बन जाता है। 


हम चाहते हैं कि दूसरा हमें ऑब्जेक्ट ना समझे बल्कि हमें चुने। लेकिन जैसे ही वह चुनते हैं उनकी आजादी फिर खतरे में पड़ती है। तो सवाल है क्या इंसान कभी किसी रिश्ते में पूरी तरह स्वतंत्र रह सकता है? सारत्र का जवाब है नहीं रिश्ता हमेशा एक खींचतान का रहेगा तुम्हारी आजादी और उनकी आजादी के बीच यही सार्त्र का अस्तित्ववाद एग्जिस्टेंशियलिज्म का क्रूर सच है। हम आजाद हैं। लेकिन हमारी आजादी लगातार दूसरों की आजादी से टकराती रहती है। अब जरा सोचो क्या कभी तुम्हें ऐसा महसूस हुआ है कि किसी ने तुम्हें फिक्स कर दिया है? जैसे तुम तो ऐसे ही हो। तुम हमेशा यही गलती करते हो।यह वही पल है जब कोई और तुम्हें परिभाषित करने की कोशिश करता है और अगर तुम मान लेते हो तो तुम्हारी आजादी कहीं खो जाती है। सार हमें चेतावनी देते हैं दूसरों की परिभाषाओं में मत फंसो क्योंकि तुम हर पल नए चुनाव कर सकते हो। अब सोचो अगर सार्थ की यह बात सच है कि हर रिश्ता ऑब्जेक्टिफाइंग है तो क्या इसका मतलब है कि हमें अकेले ही रहना चाहिए?


नहीं। सार्थ कहते हैं यह टकराव ही असल में इंसानी स्थिति है। हम इससे भाग नहीं सकते। लेकिन हम इसे समझ सकते हैं। और शायद इस समझ के साथ हम दूसरों से कम उम्मीद रख पाए। कम नियंत्रण, ज्यादा स्वीकार्यता। अब एक और बड़ा सवाल अगर इंसान लगातार नजर में है तो क्या हम सच में कभी अकेले होते हैं? सार्त्र कहते हैं अकेलापन भी एक तरह का इल्ल्यूजन है क्योंकि जैसे ही तुम अपने बारे में सोचते हो तुम्हारे दिमाग में पहले से दूसरों की आवाजें गूंज रही होती है मां-बाप की दोस्तों की समाज की यानी दूसरा हमेशा तुम्हारे भीतर मौजूद है सोचो जरा अगर तुम्हें किसी दिन सच में यहएहसास हो जाए कि कोई और तुम्हें परिभाषित नहीं कर सकता कि हर चुनाव तुम्हारा है। तो क्या तुम वैसे ही जिओगे जैसे अब तक जी रहे हो? या तुम अपनी आजादी को नए ढंग से इस्तेमाल करोगे? क्या तुमने कभी अचानक खालीपन महसूस किया है? वह जो रात के सन्नाटे में चुपचाप आकर बैठ जाता है, वह एहसास कि मेरे होने का मतलब क्या है?


जीन पॉल सारत्र कहते हैं यही है नथिंगनेस शून्यता और यहीं से इंसान की असली समस्या शुरू होती है। सारत्र मानते हैं कि बाकी चीजें जैसे पत्थर, पेड़, मेज बस हैं। उनमें कोई गैर मौजूदगी नहीं होती। लेकिन इंसान इंसान का होना हमेशा अधूरा है। हमेशा किसी बनने की ओर। यानी मैं जो हूं वह सिर्फ आधा सच है। बाकी आधा वो है जो मैं अभी तक नहीं बना। सोचो जब तुम कहते हो मैं लेखक बनना चाहता हूं। तो इसका मतलब है कि अभी तुम लेखक नहीं हो। तुम्हारे भीतर एक खाली जगह है।जिसे तुम भरना चाहते हो। यही खालीपन सार्थ के मुताबिक नथिंगनेस है और यही हमें लगातार धकेलता है कुछ और बनने की ओर। 


अब यहां पर सारत्र गहरी बेचैनी की बात करते हैं। बेचैनी किस चीज की? अपनी ही आजादी की। हां, सुनने में अजीब लगता है। लेकिन सोचो जब तुम्हें अचानक यह एहसास हो कि मेरा हर फैसला मेरी पूरी जिंदगी बदल सकता है। क्या यह डरावना नहीं है? उदाहरण लो। तुम पुल के किनारे खड़े हो। नीचे गहरी नदी बह रही है। तुम्हें सिर्फ यह डर नहीं है कि कहीं मैं फिसल ना जाऊं। असल डर यह है कि मैं खुद भी कूद सकता हूं। यही है सार की बेचेनी । आजादी इतनी खुली है कि उसमें गिरने का डर है। लेकिन इंसान यहां पर क्या करता है? वह भागता है। अपनी ही आजादी से भागता है। सारत्र इसे कहते हैं बैड फेथ। बैड फेथ का मतलब है जब हम खुद को धोखा देते हैं। जब हम कहते हैं मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। जबकि सच यह है विकल्प हमेशा था। बस हमने जिम्मेदारी नहीं ली। अब सवाल है हम ऐसा क्यों करते हैं? क्यों हम अपनी आजादी से डरते हैं? क्योंकि आजादी के साथ आती है जिम्मेदारी?


अगर मैं आजाद हूं तो मेरी नाकामी का दोष मैं किसी और पर नहीं डाल सकता। ना समाज पर, ना किस्मत पर, ना भगवान पर। यही वजह है कि लोग अक्सर तयशुदा रोल निभाते हैं। जैसे वेटर खुद को सिर्फ वेटर मान लेता है। जैसे कोई पति सिर्फ पति बनकर रह जाता है। जैसे कोई इंसान खुद को नौकरी, पैसे, पहचान इन लेबलों में कैद कर लेता है। लेकिन सच तुम्हारी पहचान कभी तय नहीं होती। तुम हर पल उसे चुनते हो। अब यहां एक गहरी बात आती है।सारत्र कहते हैं इंसान कभी पूरा नहीं होता क्योंकि जैसे ही तुम एक लक्ष्य पा लेते हो तुरंत दूसराखालीपन सामने आ जाता है। सोचो तुमने मन में ठाना मैं यह डिग्री हासिल करूंगा। मिली खुशी हुई और अगले ही दिन खालीपन लौट आया। अब नया लक्ष्य नई दौड़ यही इंसान की किस्मत है। हम हमेशा बिकमिंग में हैं। कभी बीइंग में नहीं। अब सवाल है क्या यह अंतहीन दौड़ एक सजा है या यही हमारी जिंदगी का मतलब है?


सार्त्र का कहना है यही हमारी असली ताकत है क्योंकि अगर इंसान कभी पूरा हो गया तो उसके पास बनने की चाह ही नहीं बचेगी और चाह बिना जिंदगी क्या यानी हमारी शून्यता ही हमारी सबसे बड़ी ऊर्जा है तो अब सोचो तुम्हारे भीतर जो खालीपन है उससे तुम भागते हो या उसे अपनाते हो क्या तुम उसे दुख समझते हो या उसे एक पुकार की तरह सुनते हो कि अभी बहुत कुछ बाकी है। क्योंकि सारत्र कहते हैं तुम वही हो जो तुम अभी नहीं हो। यानी तुम्हारा सच सिर्फ वर्तमान नहीं है बल्कि वह भी है जो बनने की दिशा में तुमने चुना है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का तीसरा सच यही है। खालीपन तुम्हारा दुश्मन नहीं तुम्हारा रास्ता है। वह तुम्हें पुकारता है आगेबढ़ने के लिए नया बनाने के लिए। अब सवाल यह है क्या तुम उस पुकार को सुन रहे हो या बैड फेथ में छुपकर बस निभा रहे हो?


क्या तुमने कभी महसूस किया है कि दुनिया सिर्फ चीजों से बनी नहीं है बल्कि हर चीज के पीछे एक अदृश्य मतलब छुपा है और वह मतलब कौन देता है तुम जीन पॉल सारत्र कहते हैं इंसान दुनिया को जैसे है वैसे नहीं देखता हम हमेशा उसे किसी प्रोजेक्ट के नजरिए से देखते हैं। मान लो तुम्हारे सामने एक पेड़ है। अगर तुम आराम कर रहे हो तो वह तुम्हें छाया देता है। अगर तुम बढ़ई हो तो वही पेड़ तुम्हें लकड़ी दिखेगा। अगर तुम कवि हो तो वही पेड़ एक प्रतीक बन सकता है। यानी पेड़ वही है। लेकिन उसके मतलब अलग-अलग है। मतलब इस ब्रह्मांड में पहले से नहीं लिखा। मतलब हम इंसान गढ़ते हैं। यही से सारत्र कहते हैं। पहले तुम अस्तित्व में आते हो फिर तुम अपने चुनावों और प्रोजेक्ट से अपनी पहचान एसेंस बनाते हो। अब सोचो अगर मतलब तुम खुद देते हो तो दुनिया कभी स्थिर क्यों लगे?


क्योंकि हम लगातार अपने प्रोजेक्ट बदलते रहते हैं। आज तुम्हारा प्रोजेक्ट हो सकता है पढ़ाई पूरी करना। कल वही बदलकर नौकरी पाना, फिर बदलकर परिवार बनाना। फिर बदलकर अपने बच्चों के लिए कुछ करना। यानी जिंदगी एक सीढ़ी है जिसमें हर पायदान के बाद नया पायदान आता है और यही सीढ़ी कभी खत्म नहीं होती। लेकिन यहां एक और कड़वा सच छुपा है। सारात्र कहते हैं कई बार हम अपने प्रोजेक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं भागने के लिए। भागना किससे? अपने खालीपन से अपने नथिंगनेस से। सोचो कितनी बार हम काम, रिश्ते, आदतें सिर्फ इसलिए पकड़ कर रखते हैं।क्योंकि हम अकेलेपन से डरते हैं। हम अपने ही शून्य का सामना नहीं करना चाहते। लेकिन जितना भागते हैं उतना ही वह भीतर से हमें खाता है। अब सारत्र डेथ की बात करते हैं। मृत्यु उनके लिए मौत कोई अंतिम अर्थ नहीं है। बल्कि मौत वह क्षण है जब हमारा प्रोजेक्ट अचानक अधूरा रह जाता है। यानी मौत हमें पूरा नहीं करती। वह हमें काट देती है। यही सार्त्र का दर्दनाक नजरिया है। मौत हमारी जिंदगी को कभी अर्थ नहीं देती क्योंकि अर्थ हमेशा हमारे प्रोजेक्ट से आता है और वह अधूरे रह जाते हैं। तो सवाल है अगर मौत किसी अंतिम सत्य की तरह हमें पूरा नहीं करती तो फिर क्या करें इंसान?


शास्त्र का जवाब है हर पल जियो क्योंकि तुम्हारा अर्थ कहीं और नहीं किसी और समय नहीं यही अभी बनता है तो अब सोचो अगर तुम जानते हो कि मौत तुम्हें पूरा नहीं करेगी तो क्या तुम अपने आज के चुनाव को अलग तरह से लोगे? क्या तुम किसी रिश्ते को सिर्फ इसलिए खींचोगे क्योंकि समाज कहता है क्या तुम नौकरी से चिपके रहोगे अगर वह तुम्हें भीतर से मार रही है क्या तुम अपने सपनों को टालते रहोगे यह सोचकर कि कभी ना कभी वक्त मिलेगा क्योंकि सच यह है वक्त कभी नहीं मिलेगा तुम्हें खुद बनाना होगा तो बीइंग एंड नथिंगनेस का चौथा सच यही दुनिया में कोई तयशुदा मतलब नहीं है। मतलब तुम बनाते हो और मौत किसी अंतिम जवाब की तरह नहीं आएगी। उससे पहले जो चुनाव तुमने किए वही तुम्हारी कहानी होंगे। तो सवाल यह है क्या तुम अपनी कहानी खुद लिख रहे हो या दूसरों के लिए निभा रहे हो?

क्या तुमने कभी सोचा है कि स्वतंत्रता फ्रीडम सिर्फ एक तोहफा नहीं बल्कि एक भारी बोझ भी है। जीन पॉल सार्थ बार-बार हमें यही याद दिलाते हैं। मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशाप्त है। इसका मतलब क्या है?


सोचो अगर तुम किसी जेल में हो तो वहां तुम्हारे पास चुनाव सीमित है। लेकिन सारत्र कहते हैं असली जेल तो वह है जो हम अपने दिमाग में बना लेते हैं। हम खुद से कहते हैं मेरे पास कोई चारा नहीं। मुझे यही करना पड़ेगा। लेकिन सच हर वक्त हर जगह हमेशा एक चुनाव मौजूद है। भले ही वह चुनाव कितना भी दर्दनाक क्यों ना हो। मान लो तुम एक नौकरी से ना खुश हो। तुम कह सकते हो मेरे पास कोई विकल्प नहीं। मुझे परिवार चलाना है। लेकिन सार्थ कहते हैं यह आधा सच है। पूरा सच यह है तुम्हारे पास विकल्प है। बस तुम उनकी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यानी तुम जिम्मेदार हो। अपनी नाकामी के लिए, अपनी सफलता के लिए, अपने हर कदम के लिए। और यही एहसास इंसान को सबसे ज्यादा डराता है। यही है सार्त्र की ज़िम्मेदारी का आतंक। अब सोचो जब तुम्हें पता हो कि तुम्हारी पूरी जिंदगी तुम्हारे फैसलों पर टिकी है तो तुम कैसा महसूस करोगे?


गौर से देखो। यही जगह है जहां से एंग्विश जन्म लेती है।वह बेचैनी की मेरे चुनाव सिर्फ मुझे नहीं बल्कि इंसानियत की तस्वीर को भी गढ़ रहे हैं। सार कहते हैं जब मैं चुनाव करता हूं तो मैं सिर्फ अपने लिए नहीं चुन रहा। मैं यह भी दिखा रहा हूं कि इंसान को क्या चुनना चाहिए। यानी मेरे चुनाव दूसरों के लिए एक उदाहरण बनते हैं। अब सवाल यह है अगर इंसान इतना स्वतंत्र है तो क्या वह कभी ईमानदारी से जी पाता है? यही शास्त्र ऑथेंटिसिटी की बात करते हैं। 


ऑथेंटिसिटी यानी जब इंसान अपनी आजादी और जिम्मेदारी को पूरी तरह स्वीकार करें। इसका मतलब है ना बहाने ना दोषारोपण ना भागना। बस यह मान लेना कि मैं वही हूं जो मैं चुनता हूं। लेकिन सच बताओ क्या हम ऐसे जी पाते हैं?

ज्यादातर नहीं। क्योंकि हम बैड फेथ में जीते हैं। हम खुद से झूठ बोलते हैं कि मेरे हाथ बंधे हैं। लेकिन दरअसल हमने सिर्फ सस्ता रास्ता चुना। तो अब सवाल है अगर आज तुम्हें पूरा सच मानना पड़े कि तुम्हारी जिंदगी तुम्हारेही चुनाव का नतीजा है तो क्या तुम अपने कल के फैसले बदल दोगे?


क्या तुम वही नौकरी, वही रिश्ते, वही आदतें दोहराओगे या तुम साहस करोगे अपनी आजादी को जीने का? क्योंकि सारात्र का कहना है इंसान की असली पहचान वही है जो वह करने की हिम्मत करता है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का पांचवा सच यही है। स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू है। तुम आजाद हो। लेकिन हर चुनाव का बोझ सिर्फ तुम्हारे कंधे पर है। अब सवाल यह है क्या तुम इस बोझ को ईमानदारी से उठाओगे? या फिर बैड फेथ में जीते रहोगे यह सोचते हुए कि जिंदगी तुम्हें घसीट रही है। अब तक हमने सारत्र के तीन बड़े सच देखे। एक इंसान स्वतंत्र होने के लिए अभिशापित। दो हमारी पहचान हर पल चुनावों से बनती है। तीन खालीपन और शून्यता हमारी जिंदगी का हिस्सा है जिनसे भागा नहीं जा सकता। लेकिन अब सवाल उठता है अगर इंसान इतना अकेला और अधूरा है तो क्या उसके जीवन का कोई अंतिम उद्देश्य है?


सार्थ यहां एक कड़वा जवाब देते हैं। कोई तयशुदा उद्देश्य नहीं है। हां, ना कोई भगवान तुम्हारे लिए स्क्रिप्ट लिख रहा है, ना कोई किस्मत तुम्हें खींच रही है। मतलब तुम्हारा उद्देश्य तुम्हें खुद गढ़ना होगा। सोचो यही वजह है कि सारत्र ने कहा इंसान वही है जो वह खुद बनाता है। लेकिन अब दिक्कत यह आती है अगर जीवन का कोई तयशुदा अर्थ नहीं है तो इंसान अक्सर निरर्थकता एब्सोर्डिटी में गिर जाता है। एब्सोर्डिटी का मतलब है हम लगातार अर्थ खोजते रहते हैं। लेकिन ब्रह्मांड हमें कोई जवाब नहीं देता। जैसे खाली आकाश की तरफ चिल्लाना। अब सोचो जब तुम्हें एहसास होता है कि कोई बड़ा अर्थ नहीं है तो तुम्हारे पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो तुम टूट जाते हो और बैड फेथ में भाग जाते हो या फिर तुम इस अर्थ हीनता को गले लगाते हो और खुद अर्थ गढ़ते हो। यही सारत्र हमें साहसिक रास्ता चुनने को कहते हैं। मतलब खुद बनाओ। उदाहरण के लिए मान लो तुम सुबह उठे और सोचा मेरी जिंदगी बेकार है। यह एक नथिंगनेस का अनुभव है। अब या तो तुम कहसकते हो बस सब बेकार है। या फिर तुम कह सकते हो ठीक है। मतलब कहीं बार नहीं है तो मैं ही अपना अर्थ बनाऊंगा। यही इंसान की असली ताकत है। 


अब सारत्र यहाँ एक और गहरी बात कहते हैं। मनुष्य हमेशा एक प्रोजेक्ट है। यानी तुम सिर्फ वर्तमान में जो हो वो नहीं हो। तुम हमेशा उस दिशा में हो जिसकी तरफ तुम बढ़ रहे हो। तो अगर तुम कहो मैं लेखक हूं तो सच यह है तुम लेखन की ओर बढ़ता हुआ इंसान हो। तुम्हारी पहचान तुम्हारे वर्तमान में नहीं बल्कि तुम्हारे प्रोजेक्ट में है। लेकिन अब सोचो अगर तुम अपने प्रोजेक्ट चुनना ही बंद कर दो। अगर तुम बस बहाव में बहते रहो तो सार के मुताबिक तुम अपनी आजादी छोड़ चुके हो तब तुम असल में जिंदा नहीं हो। बस जी रहे हो। यही कारण है कि सार्त्र कहते हैं असली जीवन वही है जहां तुम अपने प्रोजेक्ट खुद चुनते हो। भले ही वह मुश्किल हो, भले ही उसकी कीमत भारी हो क्योंकि अगर तुमने चुनाव नहीं किया तो कोई और तुम्हारे लिए करेगा और वह जिंदगी तुम्हारी नहीं होगी।अब सोचो जरा। अगर तुमसे अभी पूछा जाए तुम्हारा प्रोजेक्ट क्या है? तो तुम्हारा जवाब क्या होगा?


क्या तुम्हारे पास सच में कोई दिशा है या तुम बस दिन गुजार रहे हो? यह सोचते हुए कि कभी ना कभी सब ठीक हो जाएगा। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का छठा सच यही है। जिंदगी का कोई तयशुदा अर्थ नहीं है। अर्थ तुम्हें खुद बनाना है और हर पल हर चुनाव तुम्हारा अगला प्रोजेक्ट तय करता है। तो सवाल है क्या तुम आज अपनी आजादी से एक नया प्रोजेक्ट चुनोगे या फिर दूसरों केप्रोजेक्ट में फंसे रहोगे? अब तक हमने सार के विचारों में आजादी, शून्यता, चुनाव और प्रोजेक्ट्स को समझा। लेकिन इंसान की जिंदगी सिर्फ अपने आप तक सीमित नहीं है। हम हमेशा दूसरों के साथ जीते हैं। और यही सार सबसे पेचीदा सवाल पूछते हैं। दूसरों के साथ हमारा रिश्ता क्या है?


सारत्र कहते हैं दूसरों के साथ होना कभी सीधा और सरल नहीं होता क्योंकि हर रिश्ता एक तरह का संघर्ष है। क्यों?

क्योंकि जब भी कोई हमें देखता है, वह हमें ऑब्जेक्ट बना देता है और हम भी उन्हें ऑब्जेक्ट बनाने की कोशिश करते हैं। यानी इंसान हमेशा एक जंग में है। अपनी आजादी बचाने और दूसरों की आजादी को पकड़ने कीकोशिश के बीच। सोचो प्यार में हम क्या चाहते हैं? हमचाहते हैं कि दूसरा हमें पूरी तरह चुने। हमारी आजादी को स्वीकार करें। लेकिन साथ ही हम चाहते हैं कि वह हमें कभी ना छोड़े। यानी हम चाहते हैं कि उनकी आजादी हमारी कैदी बन जाए। सार्तात्र कहते हैं यही प्यार की ट्रेजडी है। प्यार में हम दूसरों को पूरी तरह पाना चाहते हैं। लेकिन अगर हमने पा लिया तो वह अब आजाद नहीं रहेगा। और अगर वह आजाद है तो उसे खोने का डर हमेशा रहेगा। यही बात नफरत में भी होती है। जब हम किसी से नफरत करते हैं तब भी हम चाहते हैं कि वह ऑब्जेक्ट बन जाए। हम उन्हें उनकी आजादी से वंचित कर देना चाहते हैं। यानी प्यार हो या नफरत। दोनों में हम दूसरे को उनकी स्वतंत्रता से काटने की कोशिश करते हैं।अब सोचो क्या कोई ऐसा रिश्ता संभव है जहां दो इंसान एक दूसरे की आजादी को पूरी तरह स्वीकार करें?


सारत्र का जवाब साफ है। यह नामुमकिन है। रिश्ता हमेशा एक खींचतान रहेगा। हम इससे भाग नहीं सकते।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें रिश्तों से भागना चाहिए। सार कहते हैं इस संघर्ष को समझना ही असलीईमानदारी है। यानी अगर तुम जानते हो कि दूसरा कभी पूरी तरह तुम्हारा नहीं हो सकता। तो तुम उससे कम उम्मीद रखोगे। तुम उसे बांधने की बजाय उसकी आजादी को स्वीकार करोगे। सोचो जरा तुम्हारे रिश्तों में कितना बैड फेथ है। कितनी बार तुमने किसी को पकड़े रखा सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें छोड़ ना दे। कितनी बार तुमने किसी को बदलने की कोशिश की ताकि वह तुम्हारी परिभाषा में फिट हो जाए और कितनी बार किसी ने तुम्हें फिक्स कर दिया। कहते हुए तुम तो हमेशा ऐसे ही रहोगे। सार हमें एक कटु सच्चाई के सामने खड़ा कर देते हैं। दूसरों के साथ होना हमेशा अधूरा है। लेकिन शायद यही अधूरापन रिश्तों की खूबसूरती भी है। क्योंकि अगर कोई पूरी तरह तुम्हारा भी हो गया तो क्या वह तुम्हें सच में इंसान लगेगा या फिर सिर्फ एक ऑब्जेक्ट बनकर रह जाएगा। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का सातवां सच यही है। रिश्ते संघर्ष है लेकिन सचेत संघर्ष। प्यार तभी ईमानदार है जब वह दूसरे की आजादी को छीनने की बजाय उसे स्वीकार करता है। अब सवाल यह है क्या तुमने अपने रिश्तों में सच में आजादी दी है या फिर तुमने उन्हें अपनी परिभाषा के पिंजरे में कैद कर रखा है?


अब तक सार हमें यह दिखा चुके हैं कि हम आजाद हैं। लेकिन इसी आजादी से डरते हैं। हम रिश्तों में हैं। लेकिन उन्हीं रिश्तों में एक छिपा हुआ संघर्ष है। हम प्रोजेक्ट्स में जीते हैं। लेकिन उनमें भी अधूरापन रहता है। तो अब सवाल उठता है क्या इंसान कभी सच्चा जीवन जी सकता है? सारर्थ का जवाब है हां! लेकिन मुश्किल है और यही है प्रामाणिकता। प्रामाणिकता का मतलब है अपने चुनाव को सचमुच अपना मानना ना बहाने ना झूठ ना बैड फेथ। सोचो अगर तुमने किसी रिश्ते में रहना चुना है तो यह मत कहो कि समाज चाहता था। अगर तुमने नौकरी पकड़ी है तो यह मत कहो कि मेरे पास कोई चारा नहीं। अगर तुमने सपनों को टाला है तो यह मत कहो कि किस्मत ने साथ नहीं दिया। प्रामाणिकता का मतलब है सच मानना कि हर चुनाव तुम्हारा ही है और उसकी कीमत भी तुम्हें ही चुकानी है। लेकिन यहां एक और कठिनाई आती है। सारात्र कहते हैं इंसान अक्सर खुद से भी भागता है। कैसे?


कभी काम में डूब कर, कभी रिश्तों में, कभी आदतों में, हम खुद को रोल में छुपा लेते हैं। जैसे कोई कहे मैं तो बस एक पिता हूं या मैं तो बस एक वेटर हूं। लेकिन यह आधा सच है क्योंकि तुम सिर्फ रोल नहीं हो। तुम हर पल हर चुनाव में कुछ और भी बन सकते हो। अब सोचो क्या तुमने कभी अपने जीवन को सिर्फ निभाया है? जिया नहीं। क्या कभी तुमने वह काम किए जो तुम्हारे दिल ने चुने ही नहीं थे? सिर्फ इसलिए कि ऐसा ही करना पड़ता है। यही है बैड फेथ और यही है वह कैद। जिससे सारात्र हमें बाहर निकलने को कहते हैं। अब यहां सारात्र एक और गहरी बात जोड़ते हैं। हेल इज अदर पीपल। दूसरे लोग ही नरक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारात्र लोगों से नफरत करते थे। उनका मतलब था जब हम अपनी पहचान पूरी तरह दूसरों की नजर से तय करते हैं तो हम अपनी आजादी खो देते हैं। यानी नरक वह नहीं कि लोग मौजूद है। नरक वो है कि हम उनकी नजरों में कैद होकर जीते हैं। तो अब सवाल यह है क्या इंसान सच में आजाद हो सकता है? अगर वह हमेशा दूसरों की नजरमें है शास्त्र का जवाब है हां लेकिन तभी जब तुम यह स्वीकार कर लो कि दूसरे भी उतने ही आजाद हैं जितने तुम यानी तुम उन्हें कंट्रोल नहीं कर सकते। सोचो जरा अगर तुम अपनी जिंदगी के हर चुनाव को बिना किसी बहाने पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर लो तो कैसा महसूस करोगे? क्या तुम हल्के हो जाओगे या और भारी?


क्योंकि सारत्र कहते हैं, प्रमाणिकता का मतलब हल्कापन नहीं है बल्कि पूरा बोझ उठाना है। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का आठवां- सच यही है। सच्चा जीवन वही है जिसमें इंसान अपनी आजादी और जिम्मेदारी दोनों को स्वीकार करें। ना दूसरों की नजरों में कैद होकर ना बहानों में छुपकर। अब सवाल यह है क्या तुम अपनी जिंदगी सच में ऑथेंटिक जी रहे हो या अब भी बैड फेथ में छुपे हो? यह सोचकर कि तुम्हारा रास्ता किसी और ने तय किया है। अब तक सार हमें बता चुके हैं कि इंसानआजादी है कि रिश्ते हमेशा संघर्ष है कि जीवन में कोई तयशुदा अर्थ नहीं है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उठता है अगर सब कुछ अधूरा है, सब कुछ संघर्ष है। तो इंसान को जीना कैसे चाहिए?


इंसान को जीना चाहिए क्रियाशील होकर यानी लगातार चुनाव करके लगातार अपना प्रोजेक्ट बनाकर क्योंकि ठहरना ही असली मौत है। सोचो जब तुम कहते हो बस अब और कुछ नहीं कर सकता। वह असल में मौत का पहला स्वाद है क्योंकि जिंदगी वही खत्म होने लगती है जहां इंसान चुनाव करना छोड़ देता है। अब यहां सार एक गहरी बात कहते हैं। मनुष्य भविष्य की ओर झुका हुआ होता है। इसका मतलब है हम कभी सिर्फ वर्तमान में नहीं जीते। हम हमेशा आगे की तरफ खींचे रहते हैं। हमारी पहचान भी वही है जो हम बनने की ओर है। लेकिन यहां पर खतरा यह है अगर तुम अपने भविष्य की कल्पना ही नहीं करते। अगर तुम कोई प्रोजेक्ट चुनते ही नहीं तो तुम दूसरों के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाते हो। यानी तुम अपनी जिंदगी खुद नहीं जीते। तुम दूसरों की पटकथा निभा रहे होते हो। 


सारत्र यही चेतावनी देते हैं। तुम्हें हर वक्त तय करना है कि तुम कौन हो। सोचो जरा। अगर तुम किसी रिश्ते में हो तो रोज तुम्हें यह तय करना है। मैं इसे क्यों निभा रहा हूं। अगर तुम किसी काम में हो तो रोज पूछना है कि क्या यह सच में मेरा चुनाव है? वरना धीरे-धीरे तुम बैड फेथ में फिसल जाओगे। अब सारात्र का एक और कठिन विचार है। मनुष्य अधूरा प्रोजेक्ट है। इसका मतलब तुम कभी पूरा नहीं हो सकते। तुम्हारा हर मकसद, हर लक्ष्य, हर सपना, बस एक और सीढ़ी है। तो इंसान को अपने अधूरेपन से जीना सीखना होगा ना कि उसे मिटाने की कोशिश करनी होगी। सोचो तुम्हारे सपनों की लिस्ट कितनी लंबी है और जब एक सपना पूरा होता है तो क्या सच में तृप्ति आती है या अगला सपना तुरंत खड़ा हो जाता है यही है सार का कहना खालीपन भागने की चीज नहीं है वह इंसान कीअसली ऊर्जा है तो अब सवाल यह है अगर जीवन में कोई तय अर्थ नहीं है अगर पूरा होना नामुमकिन है तो इंसान का रास्ता क्या है? सार्त्र कहते हैं रास्ता है लगातार बनना। प्रोजेक्ट चुनना मतलब गढ़ना और अपने चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लेना।तो बीइंग एंड नथिंगनेस का नौवा सच यही है। जीवन स्थिर नहीं है। यह एक सतत निर्माण है। एक अधूरा कैनवास जिस पर हर दिन तुम एक नई रेखा खींचते हो? अब सवाल तुमसे। क्या तुम सच में अपनी जिंदगी का चित्र खुद बना रहे हो? या तुम दूसरों के रंग से अपनीकैनवास भरने दे रहे हो?


अब हम सारात्र के विचारों की यात्रा के आखिरी पड़ाव पर पहुंचते हैं। जहां सवाल सिर्फ फिलॉसोफी का नहीं बल्कि सीधे-सीधे जिंदगी का है। सार हमें एक अंतिम सच्चाई दिखाते हैं। कोई और तुम्हारे लिए जिंदगी का मतलब नहीं गढ़ेगा। ना समाज ना भगवान ना किस्मत।मतलब तुम्हें खुद ही बनाना होगा। अब सोचो अगर कोई पूर्व लिखित स्क्रिप्ट नहीं है तो तुम्हें हर पल अपनी स्क्रिप्टखुद लिखनी होगी। लेकिन यहीं पर सार हमें चेतावनी देते हैं। अगर तुमने चुनाव नहीं किया तो भी तुमने चुनाव कर लिया क्योंकि कुछ ना करना भी एक चुनाव है। अब याद करो हमने शुरुआत में बात की थी बैड फेथ की यानी खुद से झूठ बोलने की। सार्थ कहते हैं बैड फेथ सिर्फ छलावा नहीं बल्कि एक खतरा है। क्योंकि जब तुम बार-बार अपने चुनाव से भागते हो तो धीरे-धीरे तुम्हारी पहचान धुंधली होने लगती है। तुम बस रोल निभाते रहते हो। जैसे कोई नकाब पहनकर भूल जाए कि असली चेहरा कैसा था। लेकिन सार की फिलॉसफी अंधकार में खत्म नहीं होती। वह हमें एक चुनौती देते हैं। ऑथेंटिसिटी यानी पूरी ईमानदारी से अपनी आजादी को अपनाना। अपने चुनाव की जिम्मेदारी लेना और इस स्वीकारोक्ति के साथ जीना कि मैं वही हूं जो मैं चुनता हूं। अब सोचो जरा अगर तुम यह स्वीकार कर लो कि तुम्हारी पूरी जिंदगी सिर्फ तुम्हारेहाथों में है तो क्या तुम अब भी वही फैसले लोगे जो अब तक लेते आए हो? क्या तुम वही नौकरी करोगे जिसे तुम नापसंद करते हो?


क्या तुम वही रिश्ते निभाओगे जिनमें सिर्फ आदत बची है? प्यार नहीं। क्या तुम अपने सपनों को टालते रहोगे? यह सोचकर कि समय आएगा या फिर तुम आज अभी अपनी आजादी को जीना शुरू करोगे। तो बीइंग एंड नथिंगनेस का अंतिम सच यही है। जीवन का कोई तय अर्थ नहीं है। लेकिन यही अर्थहीनता तुम्हारी सबसे बड़ी आजादी है। क्योंकि अब अर्थ तुम्हें खुद गढ़ना है। तुम हर दिन हर चुनाव में हर कदम पर अपने जीवन को लिखते हो। तुम्हारी जिंदगी कोई किताब नहीं बल्कि एक कैनवास है और उस पर ब्रश सिर्फ तुम्हारे हाथ में है। तो अब सवाल आखिरी बार तुमसे क्या तुम अपनी जिंदगी दूसरों की आंखों से देखोगे या अपनी आजादी से गढ़ोगे?क्या तुम बैड फेथ में भागते रहोगे या ऑथेंटिसिटी में जीने का साहस करोगे?क्योंकि सारात्र का कहना है मनुष्य वही है जो वह खुद से बनाता है। अब तक हमने सारत्र की गहरी जटिल बातें समझी लेकिन शायद तुम्हारे मन में सवाल हो। यह सब मेरे रोजमर्रा की जिंदगी से कैसे जुड़ता है? तो चलो सारात्र के विचारों को तुम्हारे अपने अनुभवों से जोड़कर देखते हैं। 


एक- बैड फेथ रोजमर्रा का झूठ। सोचो कितनी बार तुमने खुद से कहा है मुझे यह नौकरी करनी ही पड़ेगी। मैं इस रिश्ते से निकल नहीं सकता। असल में यह बैड फेथ है। तुम्हारे पास हमेशा विकल्प है। लेकिन तुम उसकी कीमत से डरते हो। जैसे अगर तुम नौकरी छोड़ोगे तो मुश्किलें आएंगी। अगर रिश्ता छोड़ोगे तो अकेलापन होगा। लेकिन झूठ यह है कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। सच यह है कि मेरे पास विकल्प है। लेकिन मैं उसकी कीमत नहीं देना चाहता।


दो- दलुक दूसरों की नजर सोचो जब तुम Instagram पर फोटो डालते हो तो किसके लिए डालते हो? क्या सिर्फ अपने लिए या दूसरों की नजर के लिए? यही है सारत्र का दलुक। जैसे ही कोई और तुम्हें देखता है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारी पहचान उनकी नजर में तय हो रही है और तुम उसी हिसाब से अपना रोल निभाने लगते हो। 


तीन- फ्रीडम एंड रिस्पांसिबिलिटी चुनाव का बोझ। मान लो तुम सुबह उठकर सोचते हो। आज व्यायाम नहीं करूंगा क्योंकि मैं थक गया हूं। यह भी एक चुनाव है। उसका नतीजा भी तुम्हें ही भुगतना होगा। यानी छोटी से छोटी बातों में भी सारत्र की फिलॉसफी लागू होती है। हर बार तुम चुनाव करते हो और हर बार उसकी जिम्मेदारी तुम्हारे ही कंधों पर होती है। 


चार-रिलेशनशिप्स, संघर्ष और आजादी। सोचो जब तुम अपने पार्टनर से कहते हो तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे। क्या यह सचमुच प्यार है? या यह उनकी आजादी को कैद करने की कोशिश है। सारत्र कहते हैं प्यार तभी ईमानदार है जब तुम जानते हो कि दूसरा हमेशा तुम्हें छोड़ सकता है और फिर भी तुम उसे चुनते हो।


पांच- नथिंगनेस खालीपन का सामना। रात को जब तुम अकेले होते हो और अचानक सवाल आता है मैं आखिर कर क्या रहा हूं? वही है सार्त्र का नथिंगनेस। अब यहां तुम दो काम कर सकते हो। या तो उस खालीपन से भाग जाओ। फोन, सोशल मीडिया, शराब या किसी आदत में डूब कर या फिर उसका सामना करो और कहो ठीक है। यह खालीपन मुझे पुकार रहा है। मैं कुछ नया बनाऊंगा। तो सारात्र हमें रोजमर्रा की जिंदगी में तीन चीजें सिखाते हैं। 


एक- बहाने मत बनाओ। चुनाव हमेशा तुम्हारा है। 

दो- दूसरों की नजरों में मत फंसो। तुम्हारी पहचान तुम्हारे चुनाव से है। उनकी राय से नहीं। 

तीन- खालीपन से मत भागो। वही तुम्हारी असली ऊर्जा है। 


अब आखिरी सवाल तुमसे।क्या तुम अपनी जिंदगी प्रामाणिकता में जीने के लिए तैयार हो? मतलब हर चुनाव को सचमुच अपना मानकर उसकी पूरी जिम्मेदारी लेकर क्योंकि सारत्र कहते हैं तुम्हारी जिंदगी कोई तयशुदा स्क्रिप्ट नहीं बल्कि एक अधूरा कैनवास है और उस पर रंग भरने का काम सिर्फ तुम्हारे हाथ में है।