# क्या मनुष्य का जीवन ग्रह नक्षत्रों से बंधा है? क्या जन्म पत्री ही हमारे सुख-दुख का लेखा है?
अपने अज्ञान को पहचानो। ग्रह तुम्हें नहीं चलाते तुम उन्हें देखते हो, तुम नक्षत्रों से परे हो, काल से परे हो, कर्म से परे हो, धर्म बाहरी क्रिया नहीं- भीतरी जागरण है। ग्रहों का प्रभाव मन पर है- आत्मा पर नहीं, कर्म बंधन नहीं, यदि कर्ता का अभिमान नहीं- तब पूजा व्यापार नहीं प्रेम बन जाती है! दान भय नहीं- करुणा बन जाती है। तब जन्मपत्री कागज रह जाती है और तुम अनंत आकाश बन जाते हो। ग्रह नक्षत्र अपने पथ पर चलते रहेंगे। कर्म अपना फल देगें, जो स्वयं को जान लेता है, वह इन सबके पार सदा मुक्त, सदा शांत, सदा पूर्ण है।
# राजा जनक सभा में बैठे थे। उनके मुख पर जिज्ञासा थी। हृदय में द्वंद्व था। उन्होंने पूछा भगवन क्या मनुष्य का जीवन ग्रह नक्षत्रों से बंधा है? क्या जन्म पत्री ही हमारे सुख-दुख का लेखा है? क्या पूजा और दान से भाग्य बदला जा सकता है या कर्म ही अंतिम सत्य है?
तब अष्टावक्र मुनि मुस्कुराए। उनकी वाणी में करुणा थी। पर शब्द वज्र के समान कठोर थे। उन्होंने कहा जनक यदि तेरा आत्मा शुद्ध निराकार और अकर्ता है तो ग्रह किसे बांधेंगे नक्षत्र किसे चलाएंगे जिसको तू मैं मानता है, वही भ्रम है जब तक तू शरीर को मैं समझता है तब तक तू जन्म पत्री के पन्नों में बंधा रहेगा, जिस दिन तू जान लेगा कि तू ना शरीर है ना मन है ना बुद्धि है तू शुद्ध साक्षी है उस दिन ग्रहों का प्रभाव तुझ पर समाप्त हो जाएगा।
जनक ने पुनः प्रश्न किया। परंतु शास्त्रों में तो ग्रहों की महिमा कही गई है। यज्ञ और दान का विधान बताया गया है। अष्टावक्र बोले शास्त्र अज्ञानी को मार्ग दिखाने के लिए है। ज्ञानी को बांधने के लिए नहीं जो अपने को शरीर मानता है उसके ये ग्रह हैं। दोष हैं उपाय है। पर जो आत्मा को जान लेता है उसके लिए न शुभ है न अशुभ। तूने सुना होगा कि श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं! “कर्मण्यवाधिकारस्ते” कर्म कर फल की चिंता मत कर परंतु मैं तुझ से कहता हूं कर्म भी अंततः मन का खेल है तू साक्षी बन जा कर्म स्वतः शुद्ध हो जाएगा।
जनक बोले तो क्या पूजा और दान व्यर्थ है अष्टावक्र ने कहा यदि पूजा भय से है तो वह व्यापार है यदि दान दिखावे से है तो वह अहंकार है यदि व्रत स्वर्ग की इच्छा से है तो वह सौदा है। पर यदि कर्म सहज है, निष्काम है तो वही धर्म है।
उन्होंने एक कथा सुनाई। एक व्यक्ति अपनी जन्मत्री लेकर ज्योतिषी के पास गया। ज्योतिषी ने कहा, तेरे जीवन में दुख ही दुख है, हर क्षण भारी है। वह व्यक्ति भयभीत हो गया। उसने यज्ञ कराए, दान दिए पर मन का भय नहीं गया। एक दिन वह एक ज्ञानी के पास पहुंचा, ज्ञानी ने पूछा क्या तू दुखी है? उसने कहा नहीं क्या तू दुख है?
नहीं। तो तू कौन है? उस क्षण उसे बोध हुआ कि वह साक्षी है। उसी दिन उसका भय समाप्त हो गया।
अष्टावक्र बोले जनक ग्रहों का प्रभाव उस पर है जो स्वयं को सीमित मानता है। पर आत्मज्ञानी के लिए आकाश भी छोटा है। तूने सुना होगा कि कहते हैं अहम आत्मा ब्रह्म। जब आत्मा ही ब्रह्म है तो ग्रह किसके ऊपर शासन करेंगे? सभा में मौन छा गया। अष्टावक्र आगे बोले जन्मपत्री केवल प्रारब्ध का संकेत है पर तेरा चैतन्य प्रारब्ध से परे है। जैसे सूर्य पर बादल का प्रभाव नहीं होता वैसे ही आत्मा पर ग्रहों का प्रभाव नहीं होता। बादल केवल देखने वाले की दृष्टि को ढकते हैं।
जनक ने पूछा तो क्या हमें कर्म छोड। देना चाहिए? अष्टावक्र ने हंसकर कहा नहीं जनक कर्म छोड़ने की बात भी अज्ञान है। कर्म को त्यागने वाला भी कर्म कर रहा है। बस इतना जान ले कि तू करता नहीं है। जब यह जान लेगा तब कर्म बंधन नहीं रहेगा। उन्होंने उदाहरण दिया। राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का पालन किया। चाहे ग्रह अनुकूल हो या प्रतिकूल। यदि वे जन्म पत्री देखकर निर्णय लेते तो सत्य की महिमा प्रकट ना होती। इसी प्रकार प्रहलाद ने ईश्वर भक्ति नहीं छोड़ी। चाहे ग्रहों का योग कैसा भी रहा हो। सत्य और श्रद्धा कर्म से प्रकट होती है। ग्रहों से नहीं। अष्टावक्र बोले जनक संसार भय से चलता है। यह मत करो अशुभ होगा। वह करो शुभ होगा। पर आत्मा ना शुभ है ना अशुभ। जब तू इस सत्य को जान लेगा तब पूजा भी सहज होगी। दान भी सहज होगा और कर्म भी शुद्ध होगा। तब तू ग्रहों से नहीं अपने बोध से चलेगा। जनक की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा भगवन आज तक मैं राज सिंहासन पर बैठकर भी भय में था। आज समझ आया कि बंधन बाहर नहीं भीतर है।
अष्टावक्र ने अंतिम वचन दिया। ग्रह नक्षत्र आकाश में है। पर तू आकाश से भी व्यापक है। पूजा और दान साधन है। पर सत्य तेरा स्वभाव है। जन्म पत्री एक कागज है। पर तू अनंत चेतना है। जान ले कर्म तभी धर्म है जब उसमें मैं का अभिमान ना हो। अन्यथा सब अंधविश्वास है। सभा में शांति छा गई। उस दिन जनक ने जाना कि भाग्य बदलने का रहस्य मंदिरों में नहीं। भीतर के बोध में है। और अष्टावक्र की वाणी गूंजती रही। तू ना ग्रह है, ना शरीर है, ना कर्म है, तू शुद्ध साक्षी है, मुक्त है, नित्य है। सभा का मौन अभी टूटा भी ना था कि राजा जनक ने पुनः प्रश्न किया। भगवन यदि आत्मा साक्षी है और ग्रह नक्षत्र केवल देह और मन के स्तर पर प्रभाव डालते हैं तो फिर शास्त्रों में ग्रह शांति यज्ञ दान और उपायों का इतना विस्तृत वर्णन क्यों है?
क्या यह सब व्यर्थ है?
अष्टावक्र मुनि ने जनक की ओर स्थिर दृष्टि से देखा और कहा, जनक व्यर्थ वह नहीं जो अज्ञान में किया जाए। व्यर्थ वह है जो ज्ञान के बाद भी पकड़े रखा जाए। शास्त्र सीढ़ी है मंजिल नहीं जो सीढ़ी को ही घर समझ ले वही भ्रम में है। तूने सुना होगा कि मैं मैंने कहा यदि तू मुक्त होना चाहता है तो विषयों को विष की भांति त्याग दे और क्षमा सरलता दया और संतोष को अमृत की तरह धारण कर। यहां मैंने कहीं ग्रहों का भय नहीं बताया क्योंकि भय मन का निर्माण है आत्मा का नहीं। जनक ने कहा परंतु मनुष्य का मन तो डगमगाता है। वह भविष्य जानना चाहता है। सुरक्षा चाहता है।
अष्टावक्र बोले और यही चाह उसे ज्योतिष की पकड़ में ले जाती है। भविष्य जानने की लालसा ही भय का बीज है। जो वर्तमान में स्थित है उसे भविष्य की चिंता नहीं रहती। ग्रहों का गणित मन को आश्वासन देता है। पर आत्मबोध मन को मौन कर देता है। उन्होंने एक कथा कही।
एक ब्राह्मण प्रतिदिन अपनी कुंडली देखता। हर कार्य से पहले मुहूर्त पूछता। एक दिन नदी में उसका पुत्र डूबने लगा। उसने आकाश की ओर देखा। अभी राहु काल है। तब तक पुत्र बह गया। अष्टावक्र बोले जनक मुहूर्त जीवन से बड़ा नहीं होता। साहस और करुणा ही सच्चा शुभ मुहूर्त है। सभा में सन्नाटा गहरा गया। जनक ने पूछा तो क्या ग्रहों का कोई अस्तित्व ही नहीं?
मुनि बोले अस्तित्व है पर सत्ता नहीं। जैसे स्वप्न में सिंह दिखता है वह दिखता तो है पर जागने पर उसका दांत नहीं काटता। इसी प्रकार ग्रह देह मन के स्तर पर प्रभाव दिखाते हैं। पर जो आत्मा में जाग गया उसके लिए वे स्वप्नवत हैं। उन्होंने स्मरण कराया।प्रकृति के गुण प्रकृति में ही कार्य करते हैं। यदि तू अपने को प्रकृति मानेगा तो ग्रह भी तुझे चलाएंगे। यदि तू अपने को साक्षी जानेगा तो प्रकृति अपना खेल खेलती रहेगी और तू मुक्त रहेगा। जनक ने कहा लोग कहते हैं कि शनि की साढ़े साती जीवन उलट देती है।
अष्टावक्र मुस्कुराए जनक यदि शनि तुझे गिरा सकता है तो तेरी चेतना कितनी दुर्बल है, जिसने स्वयं को जान लिया उसे ना शनि गिरा सकता है ना भाग्य उठा सकता है। सुख दुख लहरें हैं तू सागर है। लहरें उठेंगी गिरेंगी। सागर की गहराई अचल रहती है। फिर उन्होंने दान पर प्रश्न उठाया। दान किसे देता है मनुष्य ? यदि वह सोचता है कि दान से स्वर्ग मिलेगा तो वह व्यापार कर रहा है। यदि सोचता है कि दान से ग्रह शांत होंगे तो वह भय से प्रेरित है। पर यदि दान करुणा से है तो वह आत्मा की अभिव्यक्ति है। अंतर्भावना का है। क्रिया का नहीं। उन्होंने उदाहरण दिया। राजा बलि ने सब कुछ दान दिया। यहां तक कि अपना सिर भी क्या उसने ग्रह देखकर दान किया था? नहीं! उसका हृदय उदार था। इसी प्रकार विदुर ने सादा भोजन प्रेम से दिया और वह ईश्वर को प्रिय हुआ। अष्टावक्र बोले भाव ही ब्रह्म है। गणना नहीं।
जनक ने फिर पूछा और जन्म पत्री।क्या उसमें लिखा प्रारब्ध अटल है? मुनि ने उत्तर दिया। प्रारब्ध देह का है। आत्मा का नहीं। देह को भूख लगेगी। वृद्धावस्था आएगी। यह प्रकृति का नियम है। पर तू यदि स्वयं को देह मानेगा तभी दुखी होगा। जैसे अभिनेता मंच पर रोता है। पर भीतर जानता है कि यह अभिनय है। वैसे ही ज्ञानी जीवन जीता है। प्रारब्ध चलता रहता है। पर भीतर शांति अचल रहती है। उन्होंने आगे कहा। तूने देखा होगा कुछ लोग अत्यंत शुभ कुंडली लेकर भी दुखी रहते हैं और कुछ प्रतिकूल योग में भी प्रसन्न रहते हैं। कारण ग्रह नहीं दृष्टि है। दृष्टि बदले तो संसार बदल जाता है। जनक की जिज्ञासा और बढ़ी तो क्या पूजा का कोई स्थान नहीं? अष्टावक्र ने गंभीर होकर कहा। पूजा तब तक आवश्यक है जब तक तू स्वयं को अलग मानता है। जब तक तू कहता है मैं यहां हूं। भगवान वहां है तब तक पूजा से मन शुद्ध होता है। पर जब जान लेता है कि अहम ब्रह्मास्मि तब पूजा ध्यान में बदल जाती है। ध्यान मौन में और मौन आत्मबोध में उन्होंने स्मरण कराया कि बार-बार कहते हैं नेति नेति यह नहीं यह नहीं। अर्थात जो भी देखा जाए वह तू नहीं है। ग्रह दिखते हैं। कुंडली दिखती है। शुभ शुभ दिखता है इसलिए तू वह नहीं है। तू तो देखने वाला है। फिर मुनि ने अंतिम प्रहार किया। जनक अंधविश्वास तब जन्म लेता है जब मनुष्य अपनी शक्ति भूल जाता है। वह बाहर सहारा ढूंढता है। कभी ग्रह में कभी रत्न में कभी टोटके में। पर जो भीतर देख लेता है उसे पता चलता है कि उसका चैतन्य ही परम रत्न है। जिसे स्वयं पर विश्वास है उसे राहु काल का भय नहीं सताता। सभा में बैठे विद्वान भी स्तब्ध थे।
अष्टावक्र बोले धर्म भय से नहीं बोध से जन्मता है। यदि तेरी पूजा तुझे निर्भय बनाती है तो वह सत्य के निकट है। यदि तुझे और डराती है तो वह अज्ञान है। यदि तेरा दान तुझे हल्का करता है तो वह पवित्र है। यदि अहंकार बढ़ाता है तो वह बंधन है। यदि जन्मपत्री तुझे सजग करती है तो ठीक। यदि जकड़ देती है तो त्याज्ञ है। जनक ने विनम्र होकर कहा भगवन अब स्पष्ट हो रहा है कि ग्रह और कर्म दोनों प्रकृति के स्तर पर हैं पर आत्मा उससे परे है।
अष्टावक्र ने उत्तर दिया यही जानना मुक्ति है। जब तू स्वयं को प्रकृति से पृथक जान लेगा तब न पूजा तुझे बांधेगी न ग्रह डराएंगे न जन्मपत्री सीमित करेगी तब कर्म होगा पर कर्ता का अभिमान नहीं होगा। तब जीवन होगा पर भय नहीं होगा। और उस दिन सभा में यह प्रतिध्वनि देर तक गूंजती रही। ग्रह आकाश में है पर आत्मा अनंत आकाश है। कर्म प्रकृति का है। पर साक्षी शुद्ध अचल और मुक्त है। राजा जनक अब मौन थे। पर उनके भीतर प्रश्नों की अग्नि अभी शांत नहीं हुई थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा भगवन यदि आत्मा अकर्ता है यदि ग्रह केवल प्रकृति के खेल हैं यदि जन्म पत्री देह का लेखा है तो मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए क्या सब कुछ व्यर्थ है क्या ना पूजा का अर्थ है ना दान का ना कर्म का अष्टावक्र मुनि ने गंभीर होकर कहा जनक व्यर्थ कुछ नहीं परंतु सत्य का स्थान जानना आवश्यक है जब साधन को साध्य बना लिया जाता है वही अंधविश्वास जन्म लेता है। मंदिर साधन है, तीर्थ साधन है, व्रत साधन है। पर आत्म बोध साध्य है। जो साधन को ही अंतिम मान लेता है, वह बाहरी क्रिया में उलझा रहता है। जो साधन के पार देख लेता है, वह मुक्त हो जाता है। फिर उन्होंने कहा, तूने देखा होगा मनुष्य ग्रहों के भय से रत्न धारण करता है। विशेष तिथियों की प्रतीक्षा करता है। बार-बार जन्मत्री दिखाता है। परंतु क्या उसने कभी अपने मन को देखा? क्या उसने कभी पूछा कि भय कहां से उठ रहा है? भय ग्रह से नहीं उठता। भय अज्ञान से उठता है। जब तक मैं शरीर हूं यह भ्रांति है। तब तक मेरा भविष्य क्या होगा? यह चिंता रहेगी। पर जिस क्षण जान लेता है कि मैं शुद्ध चैतन्य हूं, उसी क्षण भविष्य का भय गलने लगता है।
अष्टावक्र ने उदाहरण दिया। मान ले कि कोई व्यक्ति स्वप्न में देखता है कि उसका ग्रह अशुभ है और उस पर संकट आने वाला है। वह स्वप्न में रोता है। उपाय करता है, दौड़ता है। पर जैसे ही जागता है सब समाप्त। जागरण ही उपाय है। उसी प्रकार आत्मज्ञान ही ग्रह दोष की अंतिम शांति है। उन्होंने स्पष्ट कहा तू ना करता है ना भोगता है। तू सदा मुक्त है। यदि यह वचन हृदय में उतर जाए तो कौन सा ग्रह बांध सकता है? फिर उन्होंने जनक से पूछा क्या आकाश पर धूल टिकती है? क्या सूर्य पर अंधकार स्थाई है? नहीं। वैसे ही आत्मा पर कर्मों का लेप स्थाई नहीं। लेप मन पर है और मन ही परिवर्तनशील है। जनक ने कहा पर भगवन लोग कहते हैं कि बिना पूजा किए कार्य अशुभ हो जाता है। बिना मुहूर्त देखे विवाह यात्रा करने से संकट आता है। अष्टावक्र ने यदि शुभ अशुभ मुहूर्त में है तो साहस कहां है? यदि साहस भीतर है तो हर क्षण शुभ है। जो क्षण तू जागरूक होकर जीता है वही शुभ है। जोअज्ञान में जीता है वही अशुभ है। सूर्य हर दिन उदित होता है। क्या वह पंचांग देखकर निकलता है? सभा में हल्की मुस्कान फैल गई। मुनि ने आगे कहा धर्म का अर्थ है धारण करना। सत्य को करुणा को सरलता को। यदितेरी पूजा तुझे अहंकारी बना दे। मैंने इतना जप किया, मैंने इतना दान दिया तो वह बंधन है। यदि तेरी पूजा तुझे विनम्र बना दे, सब उसी की कृपा है तो वह शुद्धि है। अंतर बाहरी क्रिया में नहीं भीतर की दृष्टि में है। फिर उन्होंने का स्मरण कराया।
श्री कृष्ण कहते हैं समत्वम योग उच्चते समता ही योग है। उसे ग्रहों का भय नहीं। अष्टावक्र ने एक और दृष्टांत दिया। एक किसान था जिसकी फसल वर्षा से नष्ट हो गई। लोग बोले तेरी कुंडली में दोष है। वह किसान मुस्कुराया और फिर से खेत जोतने लगा। अगले वर्ष अच्छी वर्षा हुई। फसल लहलहा उठी। लोगों ने कहा अब ग्रह अनुकूल है। किसान फिर मुस्कुराया। जनक उस किसान ने ग्रहों से अधिक अपने श्रम और धैर्य पर विश्वास किया। यही कर्म का सत्य है। फिर उन्होंने तीखे स्वर में कहा अंधविश्वास तब जन्म लेता है जब मनुष्य अपने उत्तरदायित्व से भागना चाहता है।वह कहता है मेरी असफलता ग्रहों के कारण है। पर वह यह नहीं देखता कि आलस्य उसका अपना था। ग्रह बहाना बन जाते हैं। जो सजग है वह बहाना नहीं ढूंढता। जनक की आंखों में तेज था। उन्होंने पूछा तो क्या भाग्य का कोई स्थान नहीं? अष्टावक्र ने उत्तर दिया भाग्य पूर्व कृत कर्मों का परिणाम है पर वह अंतिम सत्य नहीं। वह नदी की धारा की तरह है। यदि तू सोया है धारा तुझे बहा ले जाएगी। यदि तू जाग गया तैरना सीख जाएगा। जागरण ही मुक्ति है। उन्होंने कहा याद रख ग्रह नक्षत्र आकाश में घूमते हैं। पर तू उस आकाश का भी साक्षी है। जन्मपत्री तेरा प्रारंभ बता सकती है पर अंत नहीं। पूजा तुझे प्रेरणा दे सकती है पर मुक्ति नहीं दे सकती। मुक्ति केवल आत्मबोध से है। फिर उन्होंने गूढ़ वचन कहा जब तक तू स्वयं को सीमित मानता है तब तक उपाय आवश्यक है। जब तू असीम को जान लेता है। उपाय अपने आप गिरजाते हैं। जैसे नाव से नदी पार की जाती है। पर पार पहुंचकर नाव सिर पर नहीं उठाई जाती। सभा में बैठे आर्ष मुनि भी स्तब्ध थे। अष्टावक्र ने अंतिम उपदेश दिया।
जनक संसार को त्यागने की आवश्यकता नहीं पर अज्ञान को त्यागना आवश्यक है। ग्रहों को दोष मत दे। अपने अज्ञान को पहचान। पूजा को मत छोड़ पर उसे भय से मत कर। दान को मत रोक पर उसे सौदा मत बना। जन्मत्री को मत फाड़ पर उसे अपने आत्मस्वूप से बड़ा मत मान। जान ले। तू नक्षत्रों से परे है, काल से परे है, कर्म से परे है, तू शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य है। जनक उठ खड़े हुए। उनके नेत्रों में कृतज्ञता थी। उन्होंने कहा भगवन आज ज्ञात हुआ कि धर्म बाहरी क्रिया नहीं, भीतरी जागरण है। ग्रहों का प्रभाव मन पर है,आत्मा पर नहीं, कर्म बंधन नहीं, यदि कर्ता का अभिमान ना हो। अष्टावक्र ने शांत स्वर में कहा यही अंतिम सत्य है। जब तू स्वयं को जान लेता है तब ग्रह तुझे नहीं चलाते तू उन्हें देखता है। तब पूजा व्यापार नहीं प्रेम बन जाती है। तब दान भय नहीं करुणा बन जाता है। तब जन्म पत्री कागज रह जाती है और तू अनंत आकाश बन जाता है। और उस दिन सभा में यह निष्कर्ष अमिट हो गया। ग्रहनक्षत्र अपने पथ पर चलते रहेंगे। कर्म अपना फल देगा। पर जो स्वयं को जान लेता है, वह इन सबके पार सदा मुक्त, सदा शांत, सदा पूर्ण है।
No comments:
Post a Comment