कल्पना करो कि तुम बिना बोले किसी के विचार को सुन सको या किसी इंसान को देखकर उसके भीतर की सारी ऊर्जा और सच को पढ़ सकते हो। सुनने में यह चमत्कार जैसा लगता है, हमारे शारीरिक आंखें और कान केवल विंडो हैं, हम एक गहरी भ्रांति में जी रहे हैं, अशांत मन विचारों, भावनाओं और पिछले अनुभवों (संस्कारों) से भरा है। यह अशांति स्तविकता को विकृत करती है, हमें चीजों को जैसा वे हैं वैसा देखने से रोकती है। सच्ची एकाग्रता हमारे भीतर है।
समाधान: दिव्य इंद्रियों को जगाने के लिए, मन को शांत करना आवश्यक है। यह संयम के माध्यम से किया जाता है, जिसमें धारणा (एकाग्रता), ध्यान (ध्यान) और समाधि (अंतर्ग्रहण) का समकालीन अनुप्रयोग शामिल है।जब मन पूरी तरह से शांत हो जाता है, तो आंतरिक 'दिव्य इंद्रियां' जागृत होने से प्रकाश उत्पन्न होता है। जब मन अशुद्ध होता है तब यह भीतर की इंद्रियाँ पूरी तरह इन बाहरी उपकरणों पर निर्भर रहती है। तब उसकी सीमा वही हो जाती है जो शरीर की सीमा है। वह केवल उतना ही देख सकती है जितना शरीर की आंख देख सकती है। उतना ही सुन सकती है जितना कान सुन सकते हैं। लेकिन इंद्रिय स्वयं सूक्ष्म- वह ऊर्जा है। वह स्थूल पदार्थ से बंधी हुई नहीं है। जब मन शुद्ध होने लगता है। तब धीरे-धीरे यह इंद्रिय शरीर की सीमाओं से मुक्त होने लगती है। तब देखना आंख पर निर्भर नहीं रहता। सुनना कान पर निर्भर नहीं रहता। तब अनुभूति सीधे अस्तित्व से होने लगती है। अतींद्रिय शक्तियां (सिद्धियां) लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि वास्तव में मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। साधक अंतिम सत्य की खोज के बजाय नियंत्रण के लिए ऊर्जा का दुरुपयोग करते हैं। द्रष्टा ही दृश्य ! तत्त्वमसि!!
कल्पना करो कि तुम बिना बोले किसी के विचार सुन सको या किसी इंसान को देखकर उसके भीतर की सारी ऊर्जा और सच को पढ़ सको। सुनने में यह किसी
चमत्कार जैसा लगता है, हमारे शारीरिक आंखें और कान केवल विंडो हैं, जबकि सच्ची परसेप्शन हमारे भीतर है। हम एक गहरी भ्रांति में जीते हैं, वास्तव में विकृत प्रोजेक्शन को देख रहे हैं, न कि सत्य को।
समस्या: एक अशांत मन: मन को विचारों, भावनाओं और पिछले अनुभवों (संस्कारों) से भरी हुई एक अशांत झील की तरह है। यह अशांति वास्तविकता को विकृत करती है, हमें चीजों को जैसा वे हैं वैसा देखने से रोकती है।
समाधान: संयम: दिव्य इंद्रियों को जगाने के लिए, मन को शांत करना आवश्यक है। यह संयम के माध्यम से किया जाता है, जिसमें धारणा (एकाग्रता), ध्यान (ध्यान) और समाधि (अंतर्ग्रहण) का समकालीन अनुप्रयोग शामिल है।
दिव्य इंद्रियों का जागरण: जब मन पूरी तरह से शांत हो जाता है, तो आंतरिक 'दिव्य इंद्रियां' जागृत होती हैं, और 'प्रतिभा' नामक ज्ञान का अचानक प्रकाश उत्पन्न होता है। यह सूक्ष्म ऊर्जा और 'अनाहत नाद' के प्रत्यक्ष अनुभव की अनुमति देता है।
सिद्धियों का जाल: अतींद्रिय शक्तियां (सिद्धियां) लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि वास्तव में मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। साधक अंतिम सत्य की खोज के बजाय नियंत्रण के लिए ऊर्जा का दुरुपयोग करते हैं।
मुक्ति: अंतिम चरण में इन विशेष अनुभवों से भी वैराग्य की आवश्यकता होती है, जो शुद्ध चेतना और अंतिम स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।
कल्पना करो कि तुम बिना बोले किसी के विचार सुन सको या किसी इंसान को देखकर उसके भीतर की सारी ऊर्जा और सच को पढ़ सको। सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है ना? पतंजलि योग सूत्र के अनुसार यह कोई जादू नहीं बल्कि तुम्हारे ही भीतर सोई हुई दिव्य इंद्रियों का एक सटीक विज्ञान है। अगर यह समझना है कि पतंजलि किस प्रकार कहते हैं कि मनुष्य दिव्य इंद्रियों को जागृत कर सकता है। तो सबसे पहले हमें अपने उस भ्रम को तोड़ना होगा जिसमें हम अभी जी रहे हैं। क्योंकि हम सब एक बहुत गहरे भ्रम में जीते हैं। हमें लगता है कि हम संसार को जैसा है वैसा ही देख रहे हैं। हमें लगता है कि आकाश नीला है क्योंकि हमारीआंखें उसे नीला देखती हैं। और हमें लगता है कि घंटी बज रही है क्योंकि हमारे कान उसे सुनते हैं। लेकिन योग की दृष्टि कहती है कि यह जो अनुभव है यह सत्य नहीं है। यह केवल एक प्रक्षेपण है। एक ऐसा प्रक्षेपण जो अनेक परतों से छनकर आया है। और इस छानने की प्रक्रिया में वास्तविकता विकृत हो चुकी है। इसलिए अगर सूक्ष्म अनुभूति को जागृत करना है तो पहले यह समझना होगा कि हमारी वर्तमान अनुभूति की संरचना क्या है?
यह देखना होगा कि हम जो देख रहे हैं उसमें विकृति कहां से आ रही है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता तब तक हम केवल कल्पनाओं में भटकते रहेंगे। पतंजलि एक बहुत सूक्ष्म भेद बताते हैं। वे कहते हैं कि जो हम अपनी इंद्रियां समझते हैं वे वास्तव में इंद्रियां नहीं है। आंख, कान, नाक यह केवल बाहरी उपकरण हैं। यह केवल स्थूल साधन है। असली देखने वाला, असली सुनने वाला इनउपकरणों के पीछे छिपा हुआ है। उसे योग में इंद्रिय कहा गया है। जो मन के भीतर स्थित है। आंख स्वयं नहीं देखती। आंख तो केवल एकखिड़की है। देखने वाली सत्ता भीतर है जो इस खिड़की से बाहर झांकती है। जब मन अशुद्ध होता है तब यह भीतर की इंद्रिय पूरी तरह इन बाहरी उपकरणों पर निर्भर रहतीहै। तब उसकी सीमा वही हो जाती है जो शरीर की सीमा है। वह केवल उतना ही देख सकती है जितना शरीर की आंख देख सकती है। उतना ही सुन सकती है जितना कान सुन सकते हैं। लेकिन इंद्रिय स्वयं सूक्ष्म है। वह ऊर्जा है। वह स्थूल पदार्थ से बंधी हुई नहीं है। जब मन शुद्ध होने लगता है। तब धीरे-धीरे यह इंद्रिय शरीर की सीमाओं से मुक्त होने लगती है। तब देखना आंख पर निर्भर नहीं रहता। सुनना कान पर निर्भर नहीं रहता। तबअनुभूति सीधे अस्तित्व से होने लगती है। लेकिन प्रश्न यह है कि अगर यह क्षमता हमारे भीतर है तो हम उसे अनुभव क्यों नहीं कर पाते? हम इतने अंधे और बहरे क्यों हैं?
उस सूक्ष्म जगत के प्रति जो हर क्षण उपस्थित है। इसका उत्तर मन की स्थिति में छिपा हुआ है। मन को यदि एक झील की तरह समझें तो यह बात बहुत स्पष्ट हो जाती है। जब झील शांत होती है, स्थिर होती है तब उसमें चंद्रमा का प्रतिबिंब पूर्ण रूप से उतर आता है। लेकिन हमारा मन कभी शांत नहीं होता। उसमें लगातार तरंगे उठती रहती हैं। विचार, चिंता, निर्णय, भय, आकांक्षा यह सब मिलकर एक ऐसा तूफान बनाते हैं जिसमें कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता। जब इंद्रियों के माध्यम से कोई भी अनुभव भीतर आता है तो वह सीधा हमारे बोध तक नहीं पहुंचता। उसे पहले इस अशांत झील से गुजरना पड़ता है और इस झील में केवल तरंगे ही नहीं है। उसमें गाद भी भरी हुई है। यह गाद हमारे संस्कार हैं और हमारे क्लेश हैं। अज्ञान अहंकार यह क्लेश हर अनुभव को तुरंत अपने हिसाब से ढाल देते हैं। जैसे ही कोई अनुभव आता है, अहंकार तुरंत पूछता है, यह मेरे लिए अच्छा है या बुरा है, यह मुझे लाभ देगा या हानि पहुंचाएगा। और संस्कार जो हमारे पिछले अनुभवों के निशान हैं, वे उस अनुभव को पुराने रंग में रंग देते हैं। इसलिए हम कभी वर्तमान को नहीं देखते। हम हमेशा अपने अतीत को वर्तमान पर थोपते रहते हैं। अगर तुम एक कुत्ते को देखते हो तो तुम केवल कुत्ता नहीं देखते। तुम्हारे भीतर बचपन की कोई स्मृति, कोई डर, कोई अनुभव तुरंत सक्रिय हो जाता है। और तुम उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करते हो। इस तरह तुम वस्तु को नहीं देखते। तुम अपने मन के प्रक्षेपण को देखते हो। यही कारण है कि हमारा अनुभव सत्य से इतना दूर हो जाता है। हम वस्तुओं को नहीं अपने ही मन को देख रहे होते हैं और जब मन ही धुंधला है तो अनुभव कैसे स्पष्ट होगा? इस निरंतर अशांति के कारण हमारी चेतना एक भारी घनी अवस्था में जीती है। वह केवल स्थूल जगत तक सीमित रह जाती है। यह अवस्था जीवित रहने के लिए उपयोगी है। यह हमें संसार में चलने फिरने, संघर्ष करने बचने में सहायता करती है। लेकिन इसकी एक कीमत है। यह हमारी सारी ऊर्जा खा जातीहै। अहंकार को बनाए रखने और अतीत को ढोने में इतनी ऊर्जा खर्च हो जाती है कि सूक्ष्म को अनुभव करने की कोई क्षमता बचती ही नहीं। सूक्ष्म जगत कहीं छिपा हुआ नहीं है। वह यहीं है, अभी है। हर क्षण है। विचारों की तरंगे, जीवन की ऊर्जा, प्रकृति की सूक्ष्म ध्वनियां सब कुछ लगातार उपस्थित है। लेकिन हमारा भीतर का उपकरण इतना शोर से भरा हुआ है कि हम उसे सुन नहीं पाते। यह ऐसा ही है जैसे कोई बहुत ही मधुर संगीत बज रहा हो। लेकिन तुम्हारे भीतर इतना कोलाहल हो कि वह संगीत दब जाए। इसलिए पतंजलि कहते हैं कि दिव्य इंद्रियों को जागृत करने के लिए कुछ जोड़ना नहीं है।कुछ नया सीखना नहीं है। केवल हटाना है। इस शोर को हटाना है। इस झील को शांत करना है। जैसे ही तरंगे शांत होती हैं। जैसे ही गाद नीचे बैठ जाती है। वैसे ही प्रतिबिंब अपने आप स्पष्ट हो जाता है। और तब जो दिखाई देता है वही सत्य है। सामान्य अनुभूति की जिस भारी और शोर से भरी हुई अवस्था की हमने बात की उसे भेदने के लिए पतंजलि कोई आस्था कोई विश्वास या कोई कल्पना का सहारा नहीं देते। वे कोई दर्शन नहीं देते जिसे मान लेना हो। वे एक प्रक्रिया देते हैं जिसे जीना हो। वे कहते हैं कि सत्य को देखने के लिए तुम्हें कुछ मानने की जरूरत नहीं है। तुम्हें केवल अपने मन को उसअवस्था में लाना है जहां वह विकृति पैदा करना बंद कर दे। इस प्रक्रिया का नाम है संयम। संयम कोई एक क्रिया नहीं है। यह तीन अवस्थाओं का एक साथ घटित होना है। धारणा, ध्यान और समाधि। यह तीनों जब एक साथ एक ही दिशा में एक ही गहराई में उतरते हैं तब संयम जन्म लेता है और यही वह अग्नि है जिसमें सूक्ष्म अनुभूति जागती है। जब यह प्रक्रिया पूर्ण होती है तब एक चमक पैदा होती है। एक अचानक प्रकाश जिसे पतंजलि प्रतिभा कहते हैं। यह प्रकाश विचार से नहीं आता। यह सीधे अनुभव से फूटता है। मन को यदि फिर से एक झील की तरह समझें तो संयम उस झील को पूर्णतः स्थिर करने की कला है। लेकिन यह स्थिरता अचानक नहीं आती। यह धीरे-धीरे उतरती है तीन चरणों में। पहला चरण है धारणा। इसमें साधक अपने मन को एक बिंदु पर बांधता है। यह बिंदु कोई बाहरी वस्तु हो सकती है। कोई लौ, कोई ध्वनि या कोई आंतरिक केंद्र। जैसे हृदय का मध्य। इस अवस्था में प्रयास बहुत होता है। मन बार-बार भटकता है। अपने पुराने विचारों, चिंताओं और आदतों की ओर भागता है और साधक को बार-बार उसे वापसलाना पड़ता है। यह संघर्ष का चरण है। जहां साधक पहली बार यह देखता है कि मन उसका कहां नहीं मानता, यहां धैर्य की आवश्यकता है। क्योंकि हर बार मन को वापस लाना ही इस अभ्यास का सार है। यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है तो धीरे-धीरे प्रयास का तनाव कमहोने लगता है। दूसरा चरण आता है जिसे ध्यान कहते हैं। यहां मन को बार-बार खींचना नहीं पड़ता। अब वह स्वयं ही उस बिंदु की ओर बहने लगता है। जैसे गाढ़ा तेल एक पात्र से दूसरे में बिना टूटे बहता है। वैसे ही मन की धारा एक दिशा में स्थिर हो जाती है। यहां संघर्ष कम हो जाता है। लेकिन अभी भी एक दूरी बनी रहती है। देखने वाला अलग है और जिसे देखा जा रहा है वह अलग है। एक सूक्ष्म द्वैत अभी भी उपस्थित है। जब यह धारा और गहरी होती है। जब मन इतना एकाग्र हो जाता है कि वह स्वयं को ही भूल जाता है तब तीसरा चरण घटित होता है।समाधि यहां देखने वाला और देखा जाने वाला अलगनहीं रहते। मन अपनी पहचान को छोड़ देता है और जिस वस्तु पर केंद्रित है उसी का रूप ले लेता है। झील अब पूरी तरह शांत है। उसमें कोई तरंग नहीं है। कोई विकृति नहीं है। अब जो प्रतिबिंब है वह बिल्कुल शुद्ध है। उसमें अतीत की कोई छाया नहीं है। उसमें विचार का कोई हस्तक्षेप नहीं है। यहीं से प्रतिभा का जन्म होता है। यह कोई साधारण अंतर्दृष्टि नहीं है। यह अचानक होने वाला एक प्रकाश है। जहां जानना सोचकर नहीं होता। जानना सीधा घटता है। बुद्धि जब किसी चीज को समझती है, तो वह धीरे-धीरे चलती है। वह जानकारी जुटाती है। तुलनाकरती है, निष्कर्ष निकालती है। लेकिन प्रतिभा में यह सब नहीं होता। यहां कोई प्रक्रिया नहीं है। यहां केवल प्रकट होना है। जब मन समाधि में पूरी तरह वस्तु के साथ एक हो जाता है। तब वस्तु का सत्य भीतर से खुलता है। यह बाहर से देखने का नहीं। भीतर से होने का अनुभव है। एक क्षण के लिए साधक वस्तु बन जाता है और उसी क्षण उसे वस्तु का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यह ज्ञान न तो अधूरा होता है और ना ही विकृत। अब प्रश्न यह उठता है कि इस मानसिक स्थिरता का संबंध इंद्रियों के जागरण से कैसे है? यह केवल भीतर का अनुभव कैसेबाहरी अनुभूति को बदल देता है?
योग की दृष्टि में शरीर केवल यह स्थूल ढांचा नहीं है जो दिखाई देता है। इसके भीतर एक सूक्ष्म शरीर भी है जिसमें असंख्य नाड़ियां हैं जिनसे ऊर्जा का प्रवाह होता है। सामान्य अवस्था में यह नाड़ियां अवरुद्ध होती हैं। मन की अशांति विचारों का कोलाहल और शरीर की कठोरता इन मार्गों को संकुचित कर देते हैं। इसलिए इंद्रियां इन अवरोधों के पीछे कैद हो जाती हैं और उन्हें बाहरी उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ता है। संयम की अवस्था में। जब मन पूरी तरह शांत हो जाता है और प्रतिभा का प्रकाश फूटता है तब यह एक तीव्र ऊर्जा का प्रवाह बन जाता है। यह ऊर्जा उन अवरोधों को भेद देती है। जैसे कोई तीव्र विद्युत प्रवाह पुराने जमे हुए अवरोधों को जला देता है। वैसे ही यह आंतरिक शांति सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करती है। तब इंद्रियां मुक्त हो जाती हैं। अब उन्हें आंखों, कानों या नाक पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती। वे सीधे उस सूक्ष्म तत्व से संपर्क कर सकती हैं जो ध्वनि प्रकाश स्पर्श स्वाद और गंध के मूल में है। यह वही क्षण है जब दिव्य इंद्रियां जन्म लेती हैं। यह कोई चमत्कार नहीं है। यह एक प्राकृतिक परिणाम है उस पूर्ण शांति का जहां मन अब बाधा नहीं रहा। बल्कि एक स्वच्छ माध्यम बन गया है। जब संयम की तीव्रता मन को पूरी तरह शांत कर देती है और प्रतिभा का प्रकाश भीतर प्रकट होता है तब एक बहुत सूक्ष्म परिवर्तन घटता है। यह परिवर्तन बाहर दिखाई नहीं देता।लेकिन अनुभूति के स्तर पर सब कुछ बदल देता है। इंद्रियां अब शरीर के उपकरणों पर निर्भर नहीं रहती। वे अपनी जड़ से मुक्त होने लगती हैं और जैसे ही यह निर्भरता टूटती है, वैसे ही एक पर्दा भेद जाता है। एक आवरण हट जाता है। साधक की अनुभूति बाहर नहीं भीतर से फैलने लगती है। वह अब केवल स्थूल जगत को नहीं सूक्ष्म अस्तित्व को भी स्पर्श करने लगता है। सबसे पहले जो द्वार खुलते हैं वे है श्रवण और आदर्श। यह सुनना और देखना अब वैसा नहीं रहता जैसा हम जानतेहैं। यह पूरी तरह बदल जाता है। सामान्य मन के लिए ध्वनि एक यांत्रिक प्रक्रिया है। दो वस्तुएं टकराती हैं। तरंग बनती है। वह हवा के माध्यम से चलती है और कान के पर्दे को स्पंदित करती है। लेकिन जब श्रवण जागृतहोता है। तब ध्वनि का अर्थ ही बदल जाता है। तब ध्वनि किसी टकराव का परिणाम नहीं रहती। वह स्वयं अस्तित्व की एक निरंतर ध्वनि बन जाती है। साधक एक ऐसे नाद को सुनने लगता है जो कभी उत्पन्न नहीं हुआ।फिर भी सदैव है। यह अनाहत नाद है जो बिना किसी आघात के प्रकट होता है। यह नाद कहीं से आता नहीं। यह हर जगह है। कभी यह समुद्र की गहराई जैसा लगता है। कभी दूर बजती बांसुरी जैसा। कभी किसी विराट घंटी की गूंज जैसा। लेकिन यह सब केवल संकेत हैं क्योंकि यह ध्वनि शब्दों में नहीं बांधी जा सकती। यहअस्तित्व की स्वयं की धड़कन है। धीरे-धीरे साधक यह भी देखता है कि विचार केवल विचार नहीं है। वे ऊर्जा की तरंगे हैं। जिनकी अपनी ध्वनि है। हर भावना हर इरादा। हर विचार एक विशेष कंपन लेकर चलता है। जब श्रवण पूर्ण रूप से जागता है तब साधक दूसरे के भीतर उठ रही तरंगों को सुन सकता है तब छल छिप नहीं सकता क्योंकि झूठ की अपनी एक कर्कश ध्वनि होती है और सत्य की अपनी एक मधुरता शब्द कुछ भी कहे भीतर कीध्वनि सब प्रकट कर देती है। हर स्थान की भी अपनी एक लय होती है। एक जगह में प्रवेश करते ही साधक अनुभव कर लेता है कि यहां कौन सी ऊर्जा रुकी हुई है। कहीं शांति की गूंज होती है। कहीं भय की धुंध होती है। स्थान केवल स्थान नहीं रहते वे जीवित अनुभव बन जाते हैं। इसी प्रकार जब आदर्श जागृत होता है। तब देखना भी बदल जाता है। अब आंखों पर निर्भरता नहीं रहती। अबप्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती। साधक वस्तुओं को उनके बाहरी रूप से नहीं उनके भीतर की संरचना से देखता है। वह उस ऊर्जा को देखता है जो रूप को जन्म देती है। सबसे पहले वह प्राण को देखता है। जीवन की वह सूक्ष्म धारा जो हर जीवित वस्तु में प्रवाहित हो रही है। यह एक प्रकाश जाल की तरह दिखाई देती है। जिसमें असंख्य मार्ग हैं। असंख्य केंद्र हैं। यह वही है जिसे लोग कभी-कभी आभा कहते हैं। लेकिन वास्तव में यह जीवन की ऊर्जा का प्रत्यक्ष अनुभव है। इस जाल को देखकर साधक तुरंत समझ सकता है कि कहां प्रवाह सहज है और कहां रुकावट है। यह देखना दूरी और आकार से बंधा नहीं रहता। साधक चाहे तो अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर देख सकता है। जहां अस्तित्व कणों में बंठा हुआ प्रतीत होता है। और चाहे तो अत्यंत विशाल स्तर पर जहां संपूर्ण अस्तित्व एक साथ उपस्थित होता है। यहां स्थान की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। लेकिन आदर्श का अंतिम रूप केवल प्रकाश और ऊर्जा को देखना नहीं है। यह माया के पार देखने की क्षमता है। जब साधक किसी व्यक्ति को देखता है तो वह केवल उसका शरीर या उसका व्यक्तित्व नहीं देखता। वह उसके भीतर जमा हुए संस्कारों को देखता है। उसकी चेतना की अवस्था को देखता है। वह उस सत्य को देखता है जो शब्दों और रूपों के पीछे छिपा हुआ है। धीरे-धीरे इंद्रियों के बीच की सीमाएं भी मिटने लगती हैं। देखने और सुनने के बीच का अंतर समाप्त होने लगता है। कभी साधक किसी विचार को एक आकार में देखता है। कभी किसी प्रकाश को ध्वनि की तरह अनुभव करता है। अस्तित्व अब अलग-अलग इंद्रियों का संग्रह नहीं रहता, वह एक संयुक्त संगीत बन जाता है। जहां प्रकाश और ध्वनि एक ही सत्यके दो पहलू हैं। और यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। जैसे श्रवण और आदर्श जागते हैं वैसे ही स्पर्श स्वाद और गंध भी एक नए आयाम में प्रकट होते हैं। सामान्य स्पर्शमें हमें किसी वस्तु से टकराना पड़ता है। तभी अनुभव होता है। लेकिन जब स्पर्श सूक्ष्म होता है तब बिना छुए भी अनुभूति होती है। साधक केवल समझता नहीं वह अनुभव करता है। दूसरे का दुख केवल एक विचार नहींरहता। वह एक भार बनकर महसूस होता है। किसीस्थान की ऊर्जा केवल एक आभास नहीं रहती। वह एक बनावट बन जाती है जिसे छुआ जा सकता है। स्वाद भी अब केवल जीभ तक सीमित नहीं रहता। साधक किसी वस्तु के मूल रस को अनुभव कर सकता है। उसे किसी जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। एक बूंद जल में भी वह उस तत्व की संपूर्णता का अनुभव कर सकताहै। यह केवल स्वाद नहीं है। यह तत्व के साथ एकता का अनुभव है और गंध भी अब किसी रासायनिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहती। शुद्धता की अपनी एक सुगंध होती है। जब चेतना निर्मल होती है तो एक सूक्ष्म सुगंध प्रकट होती है। जिसका कोई बाहरी स्रोत नहीं होता। उसी प्रकार जब भीतर भारीपन या विकृति होती है तो उसकी भी एक गंध होती है जिसे साधक अनुभव कर सकता है। इन सब के माध्यम से एक गहरी समझ जन्म लेती है। साधक यह देखता है कि वह अलग नहीं है। वह इस अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। उसी ऊर्जा का हिस्सा है। अब संसार कोई बाहरी वस्तु नहीं रहता। वह एक जीवित ताना-बाना बन जाता है। जिसमें साधक स्वयं भी एक धागा है। जब दिव्य इंद्रियों के इस अद्भुत विज्ञान को समझ लिया जाता है। जब यह दिखाई देने लगता है कि मन कैसे शांत होकर सूक्ष्म जगत के द्वार खोल देता है। तब सहज ही एक भ्रमपैदा हो सकता है। ऐसा लग सकता है कि यही योग का अंतिम लक्ष्य है। यही सिद्धि है। यही पूर्णता है। लेकिन यहीं पतंजलि एक ऐसा मोड़ देते हैं जो पूरी दिशा बदल देता है। वे कहते हैं कि यह सब जो शक्तियां हैं यहसमाधि में बाधा है। लेकिन जागृत अवस्था में यह सिद्धियां प्रतीत होती हैं। यह एक बहुत गहरा वाक्य है। क्योंकि यह पूरी आध्यात्मिक यात्रा को उलट देता है। जोबाहर से देखने पर उपलब्धि लगती है, वही भीतर की दृष्टि से बाधा बन सकती है। सामान्य मन के लिए जो बाहर की ओर देखता है। इन शक्तियों का आकर्षण स्वाभाविक है। बिना बोले हुए को सुन लेना, छिपे हुए कोदेख लेना, तत्वों के मूल रस को अनुभव कर लेना। यह सब पूर्णता जैसा लगता है। ऐसा लगता है कि अब कुछ भी छिपा नहीं रहा। सब कुछ उपलब्ध हो गया। यह एक प्रकार का नियंत्रण है। एक प्रकार का अधिकार है इसजगत पर। लेकिन पतंजलि कहते हैं कि योग का लक्ष्य इस जगत को जानना नहीं है। इस पर अधिकार पाना नहीं है। योग का लक्ष्य उस सत्य को जानना है जो इस पूरे जगत से परे है। वह जो बदलता नहीं जो किसी भी अनुभव पर निर्भर नहीं है। और जैसे ही साधक इनशक्तियों में उलझता है, उसकी यात्रा बाहर की ओर मुड़ जाती है। सबसे सूक्ष्म खतरा यहां पैदा होता है। जब साधक को पहली बार यह अनुभव होता है कि उसके भीतर कुछ विशेष जागा है, तब अहंकार जो थोड़ी देर के लिए शांत हुआ था, वह फिर से उठता है। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं होता। अब वह और भी सूक्ष्म हो जाता है। पहले वह धन, रूप या प्रतिष्ठा में पहचान बनाता था। अब वह अपनी आध्यात्मिकता में पहचान बनाने लगता है। अब वह सोचने लगता है कि वह कुछ अलग है, कुछविशेष है। वह अपने अनुभवों को अपनी उपलब्धि समझने लगता है। वह स्वयं को देखने वाला, जानने वाला, जागृत व्यक्ति मानने लगता है। यही सबसे गहरी भूल है। क्योंकि जैसे ही उसने कहा कि यह मेरा है। उसी क्षण वह फिर से अज्ञान में गिर गया। सत्य में कोई मालिक नहीं होता। कोई दावा नहीं होता और अगर अहंकार इतना प्रबल ना भी हो तो भी एक और सूक्ष्म बाधा है वह आकर्षण सूक्ष्म जगत इतना सुंदर इतना रहस्यमय और इतना जीवंत होता है कि उसमें खो जाना बहुत आसानहै। जैसे कोई व्यक्ति पहली बार एक नई दुनिया देखे तो वह उसमें डूब जाना चाहता है। हर कोने को जानना चाहता है। लेकिन पतंजलि याद दिलाते हैं कि यह भी एक संसार ही है। यह भी परिवर्तनशील है। यह भी उसीप्रकृति का हिस्सा है। बस अधिक सूक्ष्म है। अगर साधक यहां रुक जाता है तो वह अपनी यात्रा अधूरी छोड़ देता है। वह भीतर जाने के बजाय फिर से बाहर की ओर मुड़ जाता है। इसलिए अंतिम चरण में एक और त्याग आवश्यक होता है। यह त्याग सबसे कठिन है। क्योंकिअब त्यागने के लिए कुछ साधारण नहीं बल्किअसाधारण है। जब देखने की क्षमता आती है तब उसे भी छोड़ना होता है। जब सुनने की क्षमता आती है तब उसे भी जाने देना होता है। जब अनुभव अपने चरम पर होता है तब उससे भी मुक्त होना होता है। साधक को केवलदेखना है और आगे बढ़ जाना है। उसे रुकना नहीं है। उसे अपने ही अनुभवों में खोना नहीं है। उसे हर चीज को आने देना है और फिर जाने देना है। यही वैराग्य है जो अंत में पूर्ण होता है। और जब यह अंतिम आसक्ति भी समाप्त हो जाती है। तब मन का संबंध स्थूल और सूक्ष्म दोनों जगत से टूट जाता है। तब केवल शुद्ध चेतना रह जाती है। जो किसी भी अनुभव पर निर्भर नहीं है वही स्वतंत्रता है। वही अंतिम अवस्था है।
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