जब अष्टावक्र —राजा जनक को बंधन और मोक्ष के गूढ़ रहस्य को समझाते हैं, तो वे यह स्पष्ट करते हैं कि बंधन और मोक्ष कोई बाहरी स्थितियां नहीं बल्कि चित्त की दशाएं हैं। वे कहते हैं जब मन किसी भी दृश्य, वस्तु या विचार में लिप्त होता है तो वही बंधन है। लेकिन जब चित्त हर प्रकार की दृष्टि चाहे वह इंद्रिय विषयों की हो,स्वर्ग की कल्पनाओं की हो या मोक्ष की आकांक्षा की हो से पूरी तरह विरक्त हो जाता है तो वहीं मोक्ष है। अष्टावक्र यह भी जोड़ते हैं कि केवल कर्म में सक्रिय होना ही बंधन नहीं है बल्कि जब आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी अलग दिखाई देता है और उस पर हमारी दृष्टि टिकती है तो वही दृष्टि वासना बनकर बंधन का कारण बनती है। जहां दृष्टि होगी वहां इच्छा दौड़ेगी और जहां दृष्टि ही नहीं होगी वहां वासना टिक ही नहीं पाएगी। जब मन न तो संसार की ओर आकृष्ट होता है न स्वर्ग की चाह में उलझता है और न ही मोक्ष की कामना में फंसता है तब वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है। इसीलिए जो चित्त आत्मा में स्थिर होकर समस्त विषयों से दृष्टि हटा लेता है वही वास्तव में मुक्त कहलाता है।
यहां एक स्वाभाविक शंका उठती है। यदि चित्त जब विषयों की ओर देखे तो बंधन है और आत्मा की ओर मुड़े तो मोक्ष तो क्या यह मोक्ष स्थाई हो भी सकता है? जब चित्त स्वयं ही चंचल और अस्थिर है? यदि चित्त को केवल इच्छा या प्रयास से विषयों से हटाकर आत्मा की ओर मोड़ा जाए तो वह फिर से किसी भी क्षण विषयों की ओर भाग सकता है। लेकिन जब यह विरक्ति प्रयास से नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से भीतर से जन्म लेती है तब चित्त धीरे-धीरे अपने अलग अस्तित्व को खो देता है और आत्मा में विलीन हो जाता है। उस समय चित्त और आत्मा में कोई भेद नहीं रह जाता। जो कभी अहंकार और भ्रम के कारण भिन्न प्रतीत होता था वह एकता में समाहित हो जाता है। इसी स्थिति को चित्त का आत्मा में पूर्ण लय कहा गया है। और जब यह लय घटित हो जाती है तो फिर वासना और कामना की कोई लहर उसमें उठ ही नहीं सकती। ठीक वैसे ही जैसे भूने हुए चने से कभी अंकुर नहीं फूट सकते। जब चित्त का स्वरूप ही आत्मा में समाहित हो गया तो फिर वासना के लिए कोई आधार ही नहीं बचता। यही स्थाई मोक्ष की अवस्था है जो ना इच्छा से आती है ना प्रयास से बल्कि सहज जागृति से प्रकट होती है।
अष्टावक्र यहां एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य को उजागर करते हैं। वे कहते हैं जब मैं नहीं होता तभी मोक्ष होता है और जहां मैं की उपस्थिति है वहीं बंधन जन्म लेता है। यह सूत्र केवल शब्दों का खेल नहींबल्कि आत्मज्ञान की कुंजी है। अष्टावक्र समझाते हैं कि बंधन की जड़ कोई वस्तु क्रिया या इच्छा नहीं बल्कि मैं की भावना है। वही अहंकार जो आत्मा से भिन्न किसी सत्ता का भ्रम रचता है। वास्तव में आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता नहीं है। परंतु जब चित्त रूपी हवा आत्मा रूपी शांत सागर में हलचल पैदा करती है तो एक तरंग उठती है और उसी तरंग से अज्ञान वश एक भ्रांति जन्म लेती है कि मैं कुछ अलग हूं। स्वतंत्र हूं, विशिष्ट हूं। यही अनुभव धीरे-धीरे अहंकार का रूप लेता है। फिर यह अहंकार व्यक्ति को करता और भोक्ता बना देता है। उसे ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह ही विचार करता है, निर्णय लेता है और यही उसका मन और बुद्धि बन जाते हैं। फिर वह विषयों की ओर आकर्षित होता है। कुछ पाने की लालसा में भागने लगता है और इसी दौड़ में दृष्टि निरंतर बाहर की ओर बहने लगती है।
यही बहिर्मुखता ही असली बंधन है और इसका मूल केवल एक मैं का बोध है जिसे यदि पूरी तरह मिटा दिया जाए तो वही शून्यता मोक्ष का द्वार बन जाती है। यह समूचा भ्रम और भीतर का संघर्ष केवल एक ही कारण से उत्पन्न होता है। मैं के भाव से उस अहंकार से जिसने स्वयं को आत्मा से अलग और स्वतंत्र सत्ता मान लिया है। जैसे ही यह मैं मिट जाता है। उसके साथ ही विचारों की श्रृंखला टूट जाती है। इच्छाओं की आग बुझ जाती है। वासनाएं स्वतः शांत हो जाती हैं। ना कुछ पाने की ललक रहती है। ना कुछ छोड़ने का आग्रह। जब भीतर भिन्नता ही समाप्त हो जाए तब क्या त्यागे और क्या स्वीकार करें। उस अवस्था में केवल एकशुद्ध निर्विकल्प आत्मा शेष रह जाती है और इसी स्थिति को मोक्ष कहते हैं। जब तक जीव इस अहंकार रूपी परछाई से चिपका रहता है तब तक वह आत्मा से स्वयं को अलग मानता है और बंधनों में जकड़ा रहता है।
अष्टावक्र ने बड़ी ही सटीक बात कही। उन्होंने शाखाओं या पत्तों पर वार नहीं किया। सीधे जड़ पर प्रहार किया है। वे कहते हैं, "इस अहंकार रूपी बीज को ही भून दो।" ताकि वासना का वृक्ष कभी उग ही ना सके। लेकिन विडंबना यह है कि लोग बड़ी चतुराई से चलते हैं।अहंकार नहीं छोड़ते जो सारी पीड़ा की जड़ है। वासनाएं नहीं छोड़ते जो बंधन की वजह है और फिर दिखावे के लिए चाय छोड़ते हैं। रात का भोजन छोड़ते हैं या घर द्वार को त्यागने का नाटक करते हैं। पर असली मोक्ष त्याग की इन सतही परतों से नहीं। भीतर बैठे मैं के विसर्जन से ही संभव है। आज मनुष्य धर्म के नाम पर तरह-तरह की गति विधियां कर रहा है। कोई विशाल मंदिर बनवा रहा है। कोई धर्मशालाएं खड़ा कर रहा है। कोई चुपचाप मंदिर में चंद सिक्के चढ़ा आता है या अगरबत्ती नारियल अर्पित करता है। लेकिन अष्टावक्र चेताते हैं कि अगर इन कर्मों के पीछे मैं का बोध है कि मैंने किया। मेरी भक्ति है या बदले में कुछ पाने की चाह है तो यह सब मोक्ष का मार्ग नहीं बल्कि एक और वासना का विस्तार है। जब तक भीतर मैं बना रहेगा जब तक आसक्ति और वासना जीवित रहेंगी तब तक सभी कर्म - धार्मिक भी भोग की ही एक और परछाई है।
यही कारण है कि आज का समाज चार वाक्य उस प्रसिद्ध वाक्य आर्णम कृत्वा घृतम पिबेत की ओर तेजी से भाग रहा है। आर्ण लेकर भी भोगो जी भर के जियो। यदि आरण लेने का आदर्श ना हो तो भी लोग चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वत, धोखा, शोषण और मिलावट के जरिए दूसरों का धन हड़प कर ऐश करना ही सफलता मानते हैं। चारवाक ने जो कहा वह भले ही तीखा था, लेकिन उसने इस संसार की असलियत को बेनकाब कर दिया। दुख की बात यह है कि आज अधिकांश लोग इसी सच्चाई को ढकने के लिए धर्म कामुखौटा पहनकर घूमते हैं। ताकि लोग उन्हें धार्मिक समझे। किसी धर्म ग्रंथ को पकड़कर किसी जाति या समुदाय को धार्मिक घोषित कर देना यह केवल अज्ञान नहीं बल्कि एक दिखावा है। एक ऐसा छल जिसमें सच्चाई की जगह केवल बाहरी अभिनय रह गया है। अगर कोई यह कहे कि वह गीता, कुरान, बाइबल, गुरुवाणी या धम्म पद को पढ़ता है इसलिए धार्मिक है। तो यह केवल एक भ्रम है। एक दिखावटी आडंबर। सच्चा धर्म किताबों को मानने या पढ़ने में नहीं बल्कि भीतर से खुद को रूपांतरित करने में है।
धर्म कोई सिद्धांत नहीं बल्कि जीवन में उतरी हुई सच्चाई है। और जो अपने आचरण विचार और संवेदनाओं को शुद्ध करता है वहीवास्तव में धार्मिक है। कोई चोर अचौर्य की बातें करता है। कोई हिंसक अहिंसा परमो धर्म का झंडा उठाए चलता है। कोई इंद्रियों में लिप्त व्यक्ति निष्काम कर्म का भाषणदेता है। यह सब केवल नकली आवरण है। अष्टावक्र स्पष्ट कहते हैं कि जब तक अहंकार बचा हुआ है तब तक किया गया हर कर्म चाहे वह धार्मिक क्यों ना लगे अंततः पाप ही है। इसलिए उन्होंने चारवाक की उस बात को अधिक सत्य माना जिसमें भोग को सीधे-सीधे स्वीकार कर लिया गया। कम से कम वहां दोहरा मापदंड नहीं है। इसी स्पष्टता और बेनकाब सच्चाई के कारण चारवाक को आरशी कहा गया। क्योंकि उसने सत्य को कहने का साहस दिखाया।
यदि कोई असत्य को भी स्वीकार कर ले तो वह साक्षी बन जाता है। लेकिन यदि कोई सत्य के नाम पर छल करे तो वही अधर्म है और वही नरक का द्वार खोलता है। काम, क्रोध, ईर्ष्या यह सब भीतर से उठने वाली तरंगे हैं। जिन्हें यदि हम केवल साक्षी होकर देखें तो वे स्वयं ही शांत हो जाएंगी। संसार में जो कुछ घट रहा है, वह अपनी प्रकृति के अनुसार हो रहा है।और जब हम उस प्रकृति के पार जाकर उसे देखना सीख लेते हैं, तभी असली धर्म की अनुभूति होती है। इसलिए ना तो भोग में उलझना मोक्ष है और ना ही मोक्ष की इच्छा पालना ही मुक्ति का मार्ग है। असली मोक्ष तो तब घटित होता है जब मनुष्य इन दोनों से ऊपर उठकर केवल साक्षी बन जाए। बिना किसी मैं के भाव के।
अष्टावक्र स्पष्ट कहते हैं कि यह जागृति तभी संभव है जब अहंकार पूरी तरह गिर जाए जब मैं का भाव जड़ से मिट जाए। यही उनके उपदेश का सार है। वे जनक से कहते हैं एक ही दृष्टा है जो सब में व्याप्त है और वही वास्तव में सदा मुक्त है। लेकिन तेरा बंधन बस इस एक भ्रांति में है कि तू अपने को नहीं किसी और को दृष्टा मान बैठा है। इस अत्यंत गूढ़ सूत्र में अष्टावक्र अद्वैत की सर्वोच्च स्थापना करते हैं और द्वैत के हर रूप को बंधन का कारण बताते हैं। वे कहते हैं आत्मा और परमात्मा कोई दो नहीं है। वही एक सत्ता जो तुझ में है वह ब्रह्म है। वही परमात्मा है और वही समस्त सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है। जब तू स्वयं को ही उस दृष्टा के रूप में जान लेता है। तब समझ ले कि तू जन्म से ही मुक्त था है और रहेगा। लेकिन जब तू बाहर देखने लगता है खुद को नहीं किसी अन्य को परम समझ बैठता है तभी बंधन पैदा होता है।
यह सूत्र न केवल अद्वैत की गहराई को उजागर करता है बल्कि यह भी बताता है कि मुक्ति बाहर से नहीं भीतर की दृष्टि बदलने से आती है। अष्टावक्र एक साहसी और क्रांतिकारी घोषणा करते हैं। वे कहते हैं कि तू ही वह एकमात्र दृष्टा है। तेरे अतिरिक्त कोई दूसरा देखने वाला नहीं है। जो अनेक धर्म और दर्शन ईश्वर और आत्मा को अलग-अलग सत्ता मानते हैं। जो यह कहते हैं कि कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर ऊपर आकाश में कहीं बैठा है। जिसने यह पूरी सृष्टि रची है। जो स्वर्ग नरक का निर्माण करता है। जो न्याय करता है, सजा और इनाम देता है और जिसे हम पिता मानते हैं। जबकि आत्मा उसकी संतान है।
अष्टावक्र उन सभी धारणाओं को चुनौती देते हैं। वे द्वैत के इस भ्रम को सिरे से खारिज करते हैं और घोषणा करते हैं कि आत्मा और परमात्मा दो नहीं है बल्कि वही एक चेतन सत्ता है जो साक्षी रूप में हर जगह विद्यमान है। वह ना बाहर है ना ऊपर किसी स्वर्ग में बैठा है। वह तू है मैं हूं और हर जीव के भीतर उसी का प्रतिबिंब है। यह सोच कि कोई ईश्वर हमें ऊपर से देख रहा है। हमारे पाप पुण्य का लेखा जोखा रख रहा है। यह केवल भय और गुलामी की एक कल्पना है। अष्टावक्र साफ कहते हैं कि आत्मा कोई गुलाम नहीं वह स्वयं ब्रह्म है। इस आत्मा से अलग कोई ईश्वर नहीं है और यह साक्षी भाव ही असली ईश्वरत्व है। जो स्वयं को देख लेता है, वही परम को जान लेता है क्योंकि देखने वाला कोई बाहर नहीं तू स्वयं है।
अष्टावक्र अत्यंत गहराई से कहते हैं कि आत्मा ही परमात्मा है और वही एकमात्र दृष्टा है। इसके सिवा कोई दूसरा देखने वाला नहीं। यही आत्मा स्वभाव से मुक्त है। वह किसी बंधन में जकड़ी हुई नहीं है। लेकिन जनक तेरा बंधन इस भ्रम से उत्पन्न हुआ है कि तू आत्मा के अलावा किसी और को दृष्टा मान बैठा है। जैसे ही तू दूसरे की कल्पना करता है। बंधन जन्म ले लेता है। यदि केवल एक ही सत्ता है तो फिर ना कोई बांधने वाला बचता है ना कोई बंधने वाला। वह पूर्णतः स्वतंत्र होता है। लेकिन जैसे ही ईश्वर को आत्मा से भिन्न और बड़ा मान लिया जाता है, बंधन की नींव पड़ जाती है। आत्मा अब गुलाम बन जाती है, सेवक बन जाती है और ईश्वर स्वामी हो जाता है। जब दूसरा कोई अस्तित्व में ही नहीं है तो फिर बंधन किसका? इसीलिए आत्मा से अलग ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना स्वयं में ही बंधन है। और जब यह मान्यता बनी रहती है तब आत्मा कभी मुक्त हो ही नहीं सकती।
जिन धर्मों में ईश्वर को आत्मा से अलग देखा गया है वहां मुक्ति की बात नहीं होती। वेस्वर्ग, नरक और ईश्वर के राज्य की कल्पनाओं में उलझे रहते हैं। केवल अद्वैत ही वह दृष्टिकोण है जो मुक्ति की बात करता है क्योंकि वह आत्मा को पूर्ण स्वतंत्र और स्वयं ब्रह्म मानता है। परंतु स्वतंत्रता में एक अजीब सी डर होती है। एक असुरक्षा मनुष्य का मन अपनी प्रकृति से ही गुलामी की तलाश करता है। उसे कोई सहारा चाहिए।कोई मालिक, कोई ईश्वर जिसके चरणों में वह आत्मसमर्पण कर सके और यही डर उसे बार-बार बंधन की ओर खींच लेता है जबकि मुक्ति सदा उसके भीतर ही छिपी होती है। बस दूसरे को मिटा देना होता है। मनुष्य ने जब यह मान लिया कि ईश्वर स्वामी है और वह स्वयं उसका दास तभी द्वैत की नींव पड़ी।
यहीं से ऐसे धर्मों की उत्पत्ति हुई जो आत्मा और परमात्मा को दो अलग सत्ता मानते हैं। लेकिन उपनिषदों ने साफ-साफ कहा है अयम आत्मा ब्रह्म और तत्वमसी यानी तू वही है। यह है अद्वैत की दृष्टि जिसमें कोई दूसरा नहीं, कोई ऊपर बैठा परमात्मा नहीं, बल्कि तू स्वयं वही ब्रह्म है। अष्टावक्र भी इसी अद्वैत के प्रवक्ता हैं। इसलिए वे जनक से कहते हैं कि तू वही आत्मा है जो सबका साक्षी है वही परमात्मा है। जो इस आत्मा से भिन्न किसी दूसरे ईश्वर को देखने वाला कर्मों का फल देने वाला या संचालन करने वाला मानते हैं वे अज्ञानी है ज्ञानी नहीं।
अष्टावक्र आगे एक बेहद गहन सूत्र में कहते हैं मैं करता हूं। इस अहंकार रूपी विशाल अंधकारमय नाग ने तुझे डस लिया है। अब तू इस मैं करता हूं कि विष में झुलस रहा है। लेकिन यदि तू यह विश्वास कर ले कि तू करता नहीं है और इस विश्वास रूपी अमृत को पी ले तो तू सुखी हो सकता है। अष्टावक्र यहां अहंकार को ही समस्त दुखों की जड़ बताते हैं। यही मैं की भावना है जो तुझे ब्रह्म से काटती है। चेतना से अलग करती है और तुझे उस अनंत शांति से दूर ले जाती है जो तेरा मूल स्वरूप है। जब तक तू स्वयं को कर्ता मानेगा तू बंधा रहेगा। लेकिन जैसे ही यह मैं का बोध गिरता है, वही क्षण मुक्ति का द्वार खोल देता है। जब तक तेरे भीतर अहंकार की जड़े गहरी हैं, तब तक तू स्वयं को उस अद्वितीय आत्मा से अलग अनुभव करता रहेगा और यही भिन्नता समस्त दुखों की जड़ है। यह जो भाव है कि मैं अलग हूं, मैं ही करता हूं। यही सबसे बड़ा भ्रम है।
अष्टावक्र कहते हैं कि इस अहंकार को त्याग दे और यह समझ ले कि करने वाला तू नहीं वह परम सत्ता है। तू तो केवल एक माध्यम है।एक यंत्र जिसके माध्यम से वह कार्य प्रकट हो रहा है। जब तू यह स्वीकार कर लेगा कि तू करता नहीं है और इस विश्वास रूपी अमृत को भीतर उतार लेगा तब तू वास्तविक सुख और शांति का अनुभव कर सकेगा। इस सूत्र को समझने के लिए अहंकार की प्रकृति को जानना आवश्यक है। संपूर्ण सृष्टि एक ही ब्रह्म से उद्भूत हुई है। एक ही चेतना जो विभिन्न रूपों में खिल गई है। जिस चेतना को हम शरीर में सीमित आत्मा कहते हैं। वही व्यापक स्तर पर ब्रह्म है।
प्रारंभ में जब यह ब्रह्म सुप्त अवस्था में था तब उसमें एक हलचल हुई। एक इच्छा ने जन्म लिया। मैं एक हूं। अनेक हो जाऊं। इसी इच्छा से शक्ति का जागरण हुआ और वह शक्ति असंख्य रूपों के निर्माण में प्रवृत्त हो गई। इन अनगिनत रूपों में जब चेतना आई तो उनमें यह भ्रम जन्मा कि वे उस मूल चेतना से अलग हैं और वहीं से मैं का भाव पैदा हुआ। यही मैं का बोध उस विराट ब्रह्म से अलगाव की अनुभूति कराता है और वही अलगाव बंधन पीड़ा और भ्रम की जड़ बन जाता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि मैं करता हूं। यह भाव एक विशाल अंधकारमय अहंकार रूपी सर्प का डंक है। जिसने तुझे व्यर्थ की पीड़ा में उलझा रखा है। इससे मुक्ति पाने का एक ही उपाय है। इस विश्वास रूपी अमृत को पी लेना कि वास्तव में तू करता नहीं है। सब कुछ उस परम सत्ता के द्वारा ही हो रहा है और तू मात्र एक माध्यम है। यह मैं यह अहंकार वास्तव में एक अंतहीन भिखारी है। इसे जितना भरो यह उतना ही खाली लगता है।सिकंदर जैसा विश्व विजेता भी जब मृत्यु के द्वार पर पहुंचा तो यही कह सका मैं खाली हाथ जा रहा हूं। संसार की पूरी भागदौड़, संघर्ष, विजय और प्रदर्शन सब कुछ इसी अहंकार का नाटक है। मनुष्य की मूल जरूरतें तो बेहद सीमित है, जिन्हें सहज रूप से पूरा किया जा सकता है। लेकिन उसका अधिकतर जीवन केवल अहंकार को तृप्त करने की जद्दोजहद में खप जाता है।
यह अहंकार ही उसे असाध्य कार्यों की ओर खींचता है। सिर पर आग लेकर घूमना, एक टांग पर वर्षों खड़ा रहना, नग्न होकर तप करना, महीनों उपवास करना, हिमालय की चोटियों पर चढ़ना, लंबी समाधियों में बैठना या हठयोग के कठिन अभ्यास करना। इन सब का केंद्र कहीं ना कहीं मैं कुछ विशेष हूं का भाव होता है। यही अहंकार है जो मनुष्य को अन्य जीवों से श्रेष्ठ मानने की भावना देता है। जो पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र मानने की गलती करता है। जो कहता है कि हमारा देश सबसे महान, हमारा धर्म सर्वोच्च, हमारी जाति सर्वोत्तम और मैं स्वयं सबसे विशिष्ट हूं। यह सारे कथन किसी सच्चाई का नहीं बल्कि अहंकार की घोषणा का हिस्सा है। और जब तक यह मैं बना रहेगा तब तक ना शांति संभव है ना मुक्ति। अहंकार एक ऐसा गुप्त रोग है जो जन्म लेते ही हमारे भीतर बोया जाता है। स्कूल, परिवार, समाज हर जगह इसे ही पोषित किया जाता है। यह जीवन का सबसे भारी बोझ है जिसे हम अनजाने में ढोते रहते हैं। जबकि इसके बिना ना कोई तनाव बचता है, ना कोई बंधन। हर प्रकार का पाप, अनैतिकता और द्वंद्व इसी अहंकार की संताने हैं। यह अकेला नहीं आता। इसका एक पूरा संयुक्त परिवार होता है। ईर्ष्या, क्रोध, वासना, लोभ, द्वेष, घृणा सब इसके साथ ही चलते हैं। यदि अहंकार है तो नरक तक पहुंचने के लिए कोई विशेष पाप करने की जरूरत नहीं। बाकी सब तो अपने आप घटता जाएगा।
इसीलिए अष्टावक्र ने इसे विशाल काला सर्प कहा है। ना यह साधारण है ना ही छोटा बल्कि गहराई तक डंसने वाला है। लेकिन अष्टावक्र केवल चेतावनी देकर रुकते नहीं। वे समाधान भी बताते हैं। वे कहते हैं कि इस सर्प से बचने का एकमात्र उपाय है मैं से पूरी तरह मुक्त हो जाना। यह जानना और मान लेना कि मैं कुछ नहीं करता। यह सृष्टि अपने नियमों से चल रही है और परमात्मा ही सबका करता है। यही आंतरिक विश्वास इस विष को अमृत में बदल सकता है। जब यह बोध स्थाई हो जाता है तब अहंकार खुद गिर जाता है और उसके साथ ही सारे पाप, सारे तनाव और सारी व्यर्थता भी विलीन हो जाती है। सच में इंसान तभी सुखी हो सकता है जब वह अपने भीतर से अहंकार को विसर्जित कर दे। क्योंकि अहंकारी व्यक्ति को चाहे जितना भी सुख दो वह तृप्त नहीं होता और निरहंकारी व्यक्ति को चाहो तो भी दुखी नहीं किया जा सकता।
अष्टावक्र इस सत्य को समझाने के लिए कोई जटिल साधना या कठिन तपस्या का सुझाव नहीं देते। वे केवल दृष्टिकोण बदलने की बात करते हैं। वे कहते हैं बस देखो जरा निगाह बदलो। चीजें वैसी की वैसी रहेंगी लेकिन तुम्हारा अनुभव पूरी तरह नया हो जाएगा। अगर यह नई दृष्टिपूर्ण विश्वास और गहरी निष्ठा के साथ अपनाई जाए तो जीवन में सहज ही रूपांतरण घट सकता है। दरअसल दुखों की असली जड़ कोई परिस्थिति नहीं बल्कि हमारी गलत दृष्टि है। यह भ्रम कि हम उस एकमात्र सत्ता से अलग हैं कि हम कुछ विशेष स्वतंत्र और कर्ता हैं। हम अपनी अलग ढपली बजा रहे हैं। जैसे सृष्टि का संचालन हमारे बिना रुक जाएगा। सह अस्तित्व की स्वीकृति कि हम संपूर्ण के ही एक अभिन्न अंश हैं कि ना जन्म हमारे वश में है ना मृत्यु बस इस मध्य के जीवन में ही हमने मैं बनकर कर्ता होने का झूठा अभिनय शुरू कर दिया है। अष्टावक्र इस सूत्र में जीवन का सार रख देते हैं। अगर कोई इसे सच्चे हृदय से समझ ले तो यह ज्ञान अमृत बनकर भीतर उतर सकता है और वही अमृत जीवन को सुख और शांति से भर सकता
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