Monday, 11 May 2026

* अध्याय 7: शून्य का संगीत —गोरख नाथ का 'महा- मंत्र

 अध्याय 7: शून्य का संगीत —गोरख नाथ का 'महा- मंत्र 

1. अध्यात्म के आकाश के नक्षत्र

एक समय महाकवि सुमित्रानंदन पंत और ओशो के बीच एक संवाद हुआ। प्रश्न था—भारत के आध्यात्मिक इतिहास के सबसे उज्ज्वल नक्षत्र कौन हैं? लंबी चर्चा के बाद, छँटनी करते हुए सूची चार नामों पर आकर ठहर गई: कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध और गोरख। पंत जी को आश्चर्य हुआ कि इसमें महावीर का नाम नहीं था, पर गोरख का था। इसका उत्तर अत्यंत गहरा है। महावीर एक समृद्ध परंपरा (23 तीर्थंकरों) की अंतिम कड़ी थे, वे उस मंदिर के 'स्वर्ण कलश' थे जो दूर से चमकते हैं। लेकिन गोरख? गोरख उस मंदिर की 'नींव के पत्थर' थे। नींव के पत्थर अक्सर दिखाई नहीं देते, पर पूरा ढांचा उन्हीं पर टिका होता है। गोरख के बिना कबीर, नानक, दादू या मीरा जैसे संतों का होना असंभव था।

2. गोरख: आंतरिक जगत के आइंस्टीन

जैसे भौतिक जगत के रहस्यों को सुलझाने के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन ने क्रांतिकारी कदम उठाए, वैसे ही आंतरिक जगत की खोज के लिए गोरख ने असंख्य द्वार खोल दिए। उन्होंने मनुष्य के अंतर्मन तक पहुँचने के लिए इतनी साधना पद्धतियाँ और विधियाँ दीं कि लोग उनमें उलझ गए। इसी कारण 'गोरखधंधा' शब्द प्रचलित हुआ।

गोरख खदान से निकले अनगढ़ हीरे के समान हैं। कबीर या महावीर तराशे हुए हीरे हैं, जिन्हें पहचानना आसान है। पर गोरख को समझने के लिए दृष्टि में 'धार' चाहिए। उन्होंने वह सब कुछ कह दिया जो आने वाली सदियों की साधना का आधार बना।

3. मरो वे जोगी मरो: महामृत्यु का विज्ञान

गोरख का सबसे क्रांतिकारी सूत्र है:

"मरो वे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा। तिस मरणी मरो, जिस मरणी गोरष मरी दीठा।"


हम जिस मृत्यु को जानते हैं, वह केवल शरीर का छूटना है। उसमें अहंकार जीवित रहता है और वासनाओं के कारण पुनः नया गर्भ धारण कर लेता है। वह मृत्यु वास्तविक नहीं है।

महामृत्यु वह है जिसमें अहंकार मरता है। जब 'मैं' मिट जाता है, तब वह 'सत्य' प्रकट होता है जिसे गोरख ने देखा था। यह मृत्यु कड़वी नहीं, मीठी है, क्योंकि यही अमरत्व का द्वार है। यदि आप सचमुच मरना चाहते हैं, तो शरीर को नहीं, उस 'अहंकार' को मिटाएं जो जन्म-मृत्यु के चक्र का कारण है।

4. जीवन: एक दिव्य अभिनय

जीवन को बहुत गंभीरता से लेना ही दुखों का मूल कारण है। गोरख सिखाते हैं कि इसे एक नाटक या अभिनय की तरह देखें। मंच पर कोई राम बनता है, कोई रावण; पर पर्दे के पीछे दोनों साथ बैठकर चाय पीते हैं। अभिनय करते समय रावण बनने वाला व्यक्ति दुखी नहीं होता क्योंकि उसे पता है कि वह केवल एक 'भूमिका' निभा रहा है।

जिस दिन आप यह समझ जाते हैं कि आपका यह शरीर, नाम और पद केवल एक मंच का अभिनय है, उस दिन आप 'शून्यता' को प्राप्त हो जाते हैं।

5. शून्यता ही पूर्णता है

गोरख की साधना का केंद्र है—शून्य। जब आप भीतर से पूरी तरह खाली हो जाते हैं, तभी आप उस अनंत चेतना से भर पाते हैं। जिसे दुनिया 'पागलपन' या 'उलझन' कह सकती है, वह वास्तव में परमात्मा के साथ एक होने की प्रक्रिया है। गोरख ने उन विधियों का आविष्कार किया जिनसे मनुष्य अपने ही भीतर के अंधेरे को चीरकर उस दिव्य प्रकाश तक पहुँच सके।

सारांश: नींव की ओर वापसी

अध्याय 7 हमें शिखरों की पूजा छोड़कर नींव की ओर लौटने का आह्वान करता है।

मौलिकता: गोरख भारत की संत परंपरा की जननी हैं।

अहंकार का मरण: वास्तविक जीवन वही है जो अहंकार की मृत्यु के बाद शुरू होता है।

साक्षी भाव: जीवन को एक खेल की तरह देखें; इसमें उलझें नहीं, केवल इसका आनंद लें।

अविष्कार: साधना की अनगिनत विधियाँ गोरख की ही देन हैं, जिनसे हम अपनी अंतरात्मा के द्वार खोल सकते हैं।

अब जब आपने नींव के पत्थर को पहचान लिया है, तो आप उस मंदिर में प्रवेश करने के लिए तैयार हैं जहाँ सत्य का साक्षात् निवास है

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